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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क.तीर्थ महाराज से हुई चर्चा से उद्धृत , २६ .११ .२००६ , सोफिया )

तीर्थ महाराज : हमें एक व्यक्ति में क्या प्यारा लगता है ? आधे क्षण के लिए अपने लिए सोचो .

अन्य : मैं सोचता हूँ कि हम एक व्यक्ति में दिव्य गुण पसंद करते हैं, उसकी आत्मा , जो प्रेम, दयालुता और दया की एक अभिव्यक्ति है.
तीर्थ महाराज : मुझे लगता है कि आप अंतिम जवाब दिया है!

हरी -लीला : मेरे जवाब का पहला भाग वास्तव में ऐसा ही है. लेकिन हम, लोगों को पसंद करते हैं , जो विभिन्न तरीकों से हमें संतुष्ट करते हैं. सबसे अच्छे मामले में हम उनकी आत्मा को परमेश्वर की एक झलक के रूप में पसंद करते हैं.
दानी : जो हमारे पास नहीं है ,हम उसे पसंद करते हैं,

अन्य: क्या किसी को प्रेम करने के लिए कोई कारण होना चाहिए?बिना कारण …मुझे लगता है कि प्रेम किसी बाहरी तत्व से प्रभावित नहीं होता है.

कृपाधाम : दार्शनिक दृष्टिकोण से हमें भगवान से प्यार है. व्यावहारिक रूप से हम उस व्यक्ति केविभिन्न गुणों से आकर्षित होते हैं और हम विशिष्टता को ढूंढ रहे हैं, हमारा प्रेम अद्वितीय है.

तीर्थ महाराज : “सब लोग पवित्रता की तलाश में है, हर कोई प्यार खोज रहा है…” [*]

यमुना : उसने जो कहा है ,इस संबंध में, मुझे लगता है कि हम हमेशा छह दिव्य गुणों को पसंद करते हैं जब कोई उन्हें दर्शाता है – समृद्धि, शक्ति, महिमा, सौंदर्य, ज्ञान और त्याग. एक बार रामविजय ने मुझसे कहा: “आह, तुम जो चाहती हो वह है उत्तर और दक्षिण एक साथ !” किसी तरह हमारा प्यार इसी तरह का है,जब किसी में बिलकुल विपरीत गुण हों ,तब हम ऐसे व्यक्ति को पसंद करते हैं .

हरी -लीला : .आप ,विशेष रूप से खुद के लिए बात करें , कि आप ऐसा पसंद करती हैं ,न कि हम पसंद करते हैं .
यमुना : महाराज , मैं आपति करती हूँ,मुझे लगता है कि यह सब के लिए है I

रामविजय : हम आपत्ति करते हैं.हमें यह पसंद नहीं है

रुक्मिणी : ”सबसे पहले मेरा भी यह कहना है कि जो मैं पसंद करती हूँ :वह दिव्य अभिव्यक्ति है. लेकिन वास्तव में मुझे पसंद है या प्यारा लगता है ,वह ,लोगों की दुनिया को एक बेहतर और अधिक सुंदरजगह बनाने की क्षमता है, और वे लोग,जो मुझे मुझे बेहतर बनाते है ,बेहतर बनने के लिए उत्साहित करते हैं. यह सच नहीं है कि हम उनसे प्यार करते हैं , जो हमारे लिए सुख प्रस्तुत कर रहे हैं यह वेसा ही है “तुम मुझे जितना पीटते हो ,मैं तुमसे उतना ही अधिक प्यार करता हूँ.”

तीर्थ महाराज : बिलकुल सत्य है !

प्रेमा : हमें सौंदर्य पसंद है .

दानी : मुझे लगता है कि लोग कई विभिन्न तरीकों से सुंदर हो सकते हैं . लेकिन वह क्या है ,जो बदसूरत व्यक्ति को सुंदर या सुंदर व्यक्ति को बदसूरत बना देता है,वह उसकी क्षमता है–या इसी क्रम में अक्षमता – – दूसरों की देखभाल करने कीऔर दूसरों की सेवा करने की l

रामविजय : अन्य भाषाओं में पता नहीं , लेकिन बल्गेरियाई भाषा में एक शब्द है – उसके दो अर्थ है – शब्द है “ओबिचम ” (प्रेम) है. इसका एक अर्थ है, “मैं सॉसेज पसंद करता हूँ “. इसका पूरी तरह से मतलब है “शोषण”. और बिल्कुल वही शब्द प्रयोग किया जाता है जब मैं किसी को प्यार करता हूँ – जिसे करने के लिए त्याग और सेवा का होना आवश्यक है.

रुक्मिणी : यह वो दशा है ,जिसे कह सकते हैं “ मुझे प्यार हो गया है ”…

तीर्थ महाराज : अर्ताथ “मैं भ्रम मैं हूँ ”

रामविजय: लेकिन ” मुझे प्यार हो गया है” बहुत बार इस का अर्थ है “मैं जुड़ा हुआ हूँ ” – उदाहरण के लिए सिगरेट , या शराब से . यह भी प्यार है! यह सवाल तो बहुत मुश्किल है. क्योंकि एक शब्द और एक शर्त है लगभग पूर्ण दोहन करने के लिए और पूर्ण सेवा के लिए ही! यह मेरी राय है.


तीर्थ महाराज
: धन्यवाद. इससे मुझे प्रेम की एक परिभाषा याद आती है कि प्यार शोषण कासबसे बुद्धिमान तरीका है. मुझे लगता है तुमने बहुत ही उल्लेखनीय उत्तर और राय दी है. कि हम आध्यात्मिक गुणों की पूजा करते हैं , कि हम दिव्य गुणों को पसंद करते हैं .कि हम परमेश्वर के मनुष्य में आत्मा के रूप में प्रतिनिधित्व को पसंद करते हैं – यह बहुत उच्च स्तर है. आमतौर पर हम लोगों को उनके गुणों के लिए पसंद करते हैं या उनकी संपत्ति के लिए. हो सकता है कि हम उन्हें अपने मूड के लिए प्यार करते हैं . आप बेहतर और बेहतर स्तर तक जा सकते हैं. आप उस व्यक्ति को नहीं, बल्कि पॉकेट/जेब को पसंद करते हैं .आप व्यक्ति को पसंद नहीं करते ,पर आप को पसंद है कि वह आप को पसंद करता है या पसंद करती है ,आप को व्यक्ति पसंद नहीं है , लेकिन आप की वह सेवा करता है ,यह आप को पसंद है . उसका बाहरी स्वरुप नहीं ,बल्कि आप उसे प्यार करते हैं . आप उसके अस्तित्व को प्रेम करते हैं,इस विचार के साथ यह रहता है. उसका अस्तित्व, यह कि वह मौजूद है – आप इसे प्यार करते हैं कि वह मौजूद है. ये प्यार के, बहुत उच्च स्तर hain. व्यक्ति की परम पहलू – लेकिन अगर हमारी दिव्य दृष्टि है, अगर हमारी आध्यात्मिक दृष्टि है, तो हम आत्मा से प्यार कर सकते हैं- व्यक्ति का सर्वश्रेष्ठ पक्ष . उसका बाहरी रूप नहीं ,बल्कि सिर्फ आत्मा ही . और अगर हम आत्मा को देखते हैं, तो आत्मा के गुण हमें दिव्य गुणों की याद दिलाते रहेंगे जैसे सत – चित्त – आनंद, अनंत काल, ज्ञान और परम आनंद . हम इसे दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जीवन का अर्थ है प्रेम .सत -चित- आनंद, जीवन का अर्थ परमानन्द है. जीवन(सत ) का अर्थ (चित ) प्यार (परम आनंद) है. तो यह बहुत पास है हमारे. लेकिन हम प्यार के भिन्न भिन्न स्तरको सैद्धांतिक रूप दे सकते हैं जब तक हम नहीं जानते कि यह क्या है, तब तक यह सिर्फ सिद्धांत है. चलो प्यार की एक व्यावहारिक परिभाषा ढूंढे – कि प्रेम सेवा है.प्रेम का अर्थ सेवा है. तो अगर हम व्यव्हार द्वारा अपने सिद्धांत की जाँच करना चाहते हैं – तो करें ! इसलिए यदि हम भगवान से प्यार करना चाहते हैं, हमें उसकी सेवा करनी है. और सबसे अच्छी सेवा है उसका महिमागान. यह धर्म से परे धर्म है…

[*] कृपाधाम दास द्वारा रचित गीत से उद्धरण



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