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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( श्री भ.क.तीर्थ महाराज के व्याख्यान से ,२६ मई ,२००६ )
सर्वोच्च सत्ता के छह गुण माने गए हैं .. यश ,सौंदर्य ,ज्ञान , समृद्धि ,शक्ति तथा परित्याग | . इनमें से परित्याग को समझना सबसे अधिक मुश्किल है |वस्तुत यह अनुवाद पूर्णतयः सही नहीं है | ज्यादा अच्छा है कि हम इसे स्वतंत्रता के रूप में ले |यद्यपि वही रचनाकार है तब भी वह अपनी रचना से मुक्त है |
यदि ईश्वर स्वसृजन हेतु स्वतंत्र है ,तो इसके परिणाम क्या हैं ?
धर्म की कुछ मान्यताओं के अनुसार ईश्वर ने इस सृजन को आरम्भ किया, हर चीज़ को गतिमान किया पर उसे उसकी देखभाल नहीं करता ,उसमे दखल नहीं देता |कितना स्वतंत्र और मस्तमौला ईश्वर ..वाह क्या बढिया सोच है ,कम से कम ईश्वर (का नाम ) है तो..पर मुझे वह विचार ज्यादा पसंद आता है,जहाँ ईश्वर सक्रिय है ,ध्यान रखने वाला है ,सतर्क है |अत: कृष्ण इतने भी स्वछन्द और बेपरवाह ईश्वर नहीं हैं | क्योंकि अपनी भक्ति द्वारा आप उन्हें अपनी ओर आकृष्ट कर सकते हो ! जीने के लिए यही आपका अनुभव है |इस तरह से जिओ कि यह आप नहीं हैं, जो ईश्वर को देख रहे हैं,बल्कि वह (ईश्वर )आप पर निगाह रख रहा है | इस तरह से आप कृष्ण को आमंत्रित कर सकते हैं और वे सब कुछ देख लेंगें | यद्यपि वे सृजन हेतु स्वतंत्र है ,उनका ह्रदय बहुत स्नेही है| आध्यात्मिक संपर्क के लिए लोभ दर्शाना- उनका ध्यान आकर्षित करने का बस एक यही तरीका है | अगर इसे चाहते हो तो यह मिल जाएगा | परन्तु सावधान –जो आप चाहते हो, वही मिलेगा |इसलिए अपनी इच्छाओं को स्पष्ट करो और शुद्ध रखो |
क्या हमारी इच्छाएँ मुक्त हैं ?कृष्ण को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए ? जब आप उन्हें स्वीकार करते हैं तो ,प्रवेश-शुल्क कागज के एक छोटे से टुकड़े पर लिखा होता है “.स्वेच्छा ” और खजांची उसे फाड़ देता है |स्वेच्छा ..कैसी स्वेच्छा अगर कोई दैविक प्रेम के समूह में नाम लिखवा लेता है तो ,तो किस तरह की स्वेच्छा को हम स्वीकार कर सकते हैं ?पर डरो नहीं .यह तो प्यारी सी क्रीडा है |
मुझे सन्देह है कि दैविक प्रेम में कोई अपनी इच्छा भी होती है ..कुछ समय बीतने के बाद( बिलकुल नहीं हो सकती ) | हो सकता है कि प्राथमिक स्तर पर हमें लगता है ,हम सोच सकते है कि हम “मुक्त” हैं ..हम ये कर सकते हैं ,वो कर सकते हैं , पर वस्तुत: जीव सदैव दबाव में रहता है | भौतिक उर्जा – माया के दबाव में , जो कभी कोई परेशानी खड़ी कर सकती है -या दैविक ऊर्जा -योग माया के प्रभाव में ,जो एक अलग तरह की प्रसन्नता देती है |पर हमारी स्तिथि सदैव अनुचर /अधीनस्त की होती है , अत:, “महात्मानस तू मम पर्थ दैविम प्रकृतिम अशुतहा” अर्थात – महान आत्माएं सदैव खोज करती रहती है और दैविक ऊर्जा के संरक्षण में स्वयं को छोड़ देती हैं | यही हमारी स्व – इच्छा है ,कृष्ण के प्रति ” हाँ ” कहने की इच्छा |. और जब आपने “हाँ” कह दिया तो “ना” कैसे कह सकते हो ? “ना ” कहने की अब आप की आज़ादी ख़त्म हो गयी |अंतत: जीवित हुए | स्वभावत: कभी कभी हम बारबार कृष्ण को “ना” कह देते हैं ,पर आखिर में यदि हम सहमत हो जाते हैं तो हमें मानना ही पड़ता है ! और यह मूर्खतापूर्ण “हाँ ” नहीं,बल्कि सर्जनात्मक,सार्थक,”हाँ ” होना चाहिए |
विशिष्ट स्तिथियों में,खास केसों में ,वे भक्त के जीवन में प्रवेश करते हैं और वे उसे प्रेरित करते हैं | हम कृष्ण को हमारे जीवन में हस्तक्षेप करने से रोक नहीं सकते ,चाहते हुए भी नहीं रोक सकते | हम उन्हें कैसे रोक सकते हैं ? वे स्वतंत्र हैं ,यंहा तक कि आपकी स्वेच्छा के विरूद्ध कुछ करने को भी स्वतंत्र हैं !! हाँ,पर किन्ही बहुत खास केसों में ऐसा होता है |.यदि वे किसी को चुन लेते हैं –तो वह कुछ खास ही है | l,यदि वे आप के समीप आना चाहते हैं- जबकि आप माया – राक्षसी की गोद में सोना चाहते हैं , वे आपको जगाना चाहते हैं | क्या तुम रोक पाओगे? बहुत देर तक नहीं!…कहते हैं कि जब कृष्ण कुछ देना चाहते हैं तो आप के दस हाथ भी हो जाएँ ,आप मना नहीं कर सकते | पर जब वे कुछ छीनना चाहते हैं तो सौ-सौ हाथ होने पर भी आप उसे बचा नहीं सकते |तो वे हस्तक्षेप तो करते हैं |कभी कभी स्वयं तो नहीं,पर किन्ही एजेंटों के द्वारा ,गुप्त एजेंटों द्वारा , जो देखने में तो इस भ्रामक खेल का हिस्सा हैं | पर यदि आप किसी साधू से मिल जाते हैं ,तो मानो कृष्ण ने आप के जीवन में दखल दे दिया | उन्होंने आपके भ्रमजाल के सुन्दर स्वप्न को तोड़ दिया क्योंकि वे हमारे हित के लिए काम कर रहे हैं | “जीव जागो – ओ सुप्त आत्मा ,कृपया जागो !! देवत्व के उच्च स्तर की क्या बात करें ,जब वे आपके सेवक बनाने तो तैयार हैं ? जैसा अर्जुन के साथ हुआ..उन्होंने सारथी के रूप में शुरुवात की | सारथी कोई बहुत ऊँचा पद नहीं है |पर ईश्वर स्वयं,अपने भक्त के रथ पर इतना नगण्य पद लेने को तैयार हैं |
तो आइडिया यह है कि कभी कभी रोल बदल जाते हैं | आप सोचते हैं कि आपने स्व-इच्छा गवां दी है ,जबकि होता इसका बिलकुल उल्टा है –यदि आप पूर्ण एवं शुद्ध भाव भक्ति का पालन करते हैं,कृष्ण अपनी इच्छा खो बैठते हैं |क्या विचार है ! ईश्वर सेवक की भांति ! ईश्वर स्वाधीन नहीं है ?!ऐसा कैसा हो सकता है ? यह संभव होता है ,केवल प्रेम की गांठ से | श्रीला श्रीधर महाराज ने इसे इतने सुन्दर तरीके से बताया है ! वे कहते हैं : एक छोटा बच्चा अपने पिता का हाथ पकडे हुए है और पिता उस छोटे बच्चे से कंही ज्यादा बलवान है –फिर भी ,सिर्फ अंगुली के सहारे बच्चा पिता को राह दिखाता है और पिता वही करेंगे,जो बच्चा चाहता है | यह एक विशेष गुण है ,जहाँ छोटा बड़े को नियंत्रित कर सकता है | यह एक खास प्रकार के यंत्र से संभव हो सकता है और यही दैविक प्रेम है | मैं समझता हूँ कि इस कहानी का अंत यही है |यह भक्ति का सौंदर्य है- कि यह तुच्छ ,नगण्य जीव,अपने प्रेम के सामर्थ्य द्वारा,कृष्ण का हाथ पकड़ कर या कृष्ण के चरण कमल पकड़ कर –एक प्रकार से –उसे जाने नहीं देता | यह अति सुन्दर धारणा है |
बहुत पहले हम अपनी आज़ादी खो बैठे हैं , स्वेच्छा भी | आओ इस नुकसान के व्यापार से एक अच्छा सौदा कर लें |


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