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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६  .०२ .२००७ , सोफिया )
समय के तीन चरण, अतीत, वर्तमान और भविष्य हैं. और हालांकि हम इन तीन चरणों की बात करते हैं, वे वास्तव में मौजूद नहीं है. क्या आपका कोई  अतीत है? नहीं,विगत चला गया है, इसलिए यह अस्तित्वहीन है . भविष्य  अस्पष्ट है. इसलिए यह है नहीं. यह केवल वर्तमान क्षण है, लेकिन जब मैं कहता हूँ “वर्तमान क्षण”, यह पहले ही चला गया है. हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं: कुछ होता नहीं  है. इसलिए समय नहीं है.क्या  समय है? अचिन्त्य  भेदाभेदा  तत्त्व  – हाँ और नहीं भी – एक साथ  . निरपेक्ष भाव में समय मौजूद नहीं है, अभी हम देखते हैं कि समय यहाँ है  और गुजर रहा है. कई लोगों का कहना है कि समय गुजर रहा है, जबकि समय हँस रहा है और देखता है कैसे मनुष्य गुजर रहे हैं.
हमें समझना चाहिए कि समय ,परम  प्रभु की  एक ऊर्जा है और यह एक समाप्त होती ऊर्जा के रूप में भौतिक मंच पर प्रकट होता   है. समय इस तरह का  एक कारक  है जो कि चीजों के घटने  का  अनुक्रम प्रदान करता है. वर्तमान अतीत का भविष्य और   भविष्य का अतीत  है. यदि आप वर्तमान क्षण को समझ लेते हैं तो  आप भूत और  भविष्य को समझ लेते  हैं. यदि आप को वर्तमान क्षण का पूरा ज्ञान है, तो आप समझ सकते हैं कि क्या चला गया है और क्या आने वाला है . हमने  यदि एक उचित तरीके से  अपने  समय का उपयोग किया है. और अगर हम भगवान की स्तुति के लिए इस  वर्तमान क्षण का उपयोग करें, तो हम अतीत जानते हैं और हमें भविष्य का भी  पता है. इसलिए यह  स्थायी वचनबद्धता होनी चाहिए.
समय क्या है,इसे समझने के विभिन्न स्तर हैं.फिर भी कुछ स्थाइत्व होना चाहिए. कृष्ण-सेवा में स्थायी  वचनबद्धता का अर्थ है  पूर्ण अनुराग. पूर्ण अनुराग,पूर्ण स्वतंत्रता के साथ  क्यूंकि  पूर्ण वचनबद्धता संसार के विभिन्न संस्थानों में मिल सकती है.जैसे कि आप सेना में भारती हो जाते हैं तो वे आप को पूरा काम देते हैं . या फिर आप यदि जेल में है तो भी आप व्यस्त हैं -पूर्ण रूप से . और यदि आप लोहे की सलाखों के दूसरी ओर हैं – माया का बंदीगृह – तब यह स्वतंत्रता खलती है-तब भी आप पूरी तरह से बंधे हुए हैं ,हम हर समय व्यस्त हैं .लेकिन साधारण व्यस्तता और धार्मिक  व्यस्तता भिन्न हैं. इन संस्थानों द्वारा दी गयी व्यस्तता जबरदस्ती की है. आपको आदेश मिलता है और आपको उसका पालन करना है .भ्रम छली होता है,वह इस तरह से आदेश देता है की आप खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं.
तुम्हें लगता है कि “मैं कर सकता हूँ! मैं इस तरह या उस तरह का चुनने के लिए  मुक्त हूँ. “लेकिनवास्तव में हम प्रकृति की शक्तियों द्वारा संचालित होते  हैं और भ्रम का जादू हमें चला  रहा होता है. इसलिए केवल बल द्वारा या इस जादू से जुड़ा होना पर्याप्त नहीं है. हमें  अपनी स्वतंत्र इच्छा से जुड़ना  है. हमें  ‘हां’ कृष्ण को कहना है. यदि सेवा बल द्वारा हासिल की गयी  है, तब हमारा  “ध्यान” इस पर होगा कि किस प्रकार इस वचनबद्धता को तोड़ दिया जाए. लेकिन अगर हम कहें और हम सहमत हैं: “हाँ! मैं करना चाहता हूँ! में यहाँ रहना चाहता हूँ मैं मदद करना चाहता हूँ, मुझे क्या करना है? बताइए  “तो अगर हम उचित आदमी हैं, तो हम यह कर जाएगें . पूर्ण वचनबद्धता  के साथ पूर्ण स्वतंत्रता: यह  भक्ति सेवा में सबसे अच्छासंयोजन है. कृष्ण के विचारों, गतिविधियों, शब्दों में स्थायी वचनबद्धता  – अतीत, वर्तमान और भविष्य में. जब भी आप मुसीबत में हो या  खुशी होती है, तुम बाहर कॉल कर सकते हैं: “जय  राधे श्याम!” स्थिति बदल जाएगी. दुख चला जाएगा. और खुशी भी चली जायगी ? नहीं ,खुशियाँ  बढती जाएँगी.
भगवान के पवित्र नामों के  जप से ,  वह सब कुछ ,जो अशुभ है, दूर हो जाता है. कई लोग  अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं. आपको  पता है कि आपका  अतीत आपके  बाएं हाथ पर लिखा हैऔर आपका  भविष्य  आपके  दाहिने हाथ पर लिखा है. लेकिन अगर आप अपने अतीतऔर अपने भविष्य को बदलना चाहते हैं, तो एक सुझाव है. बस ताली बजें ,जब एक कीर्तन होता है. क्योंकि तब आपकी हथेलियों की रेखाएं बदल जाएंगी और वह सब कुछ ,जो अशुभ है,वह दूर हो जाएगा .
भगवान की सेवा में स्थायी लगन   – यही  भक्ति योग का लक्ष्य है.  व्यस्तता केवल बलपूर्वक नहीं  ,बल्कि  मुक्त समर्पण द्वारा हो . “मैं यहाँ हूँ, मुझे आपकी सेवा में संलग्न होना  है .” हरे कृष्णमहामंत्र एक निमंत्रण की तरह है. जब आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, एक अतिथि की तो आप एक अच्छा पोस्टर बनाते हैं, अपने प्रवेश द्वार को सजाते हैं  और  कहते हैं “आपका स्वागत है!” तो फिर आपका  मेहमान आता है और आप  उसे एक  कप पानी भी नहीं  देते.  अतिथि को  कैसा लगेगा? वे  कहेंगे: “ठीक है, यह एक बहुत अच्छा आमंत्रण है, लेकिन बहुतखराब सत्कार . बेहतर है कि मैं चल जाऊं.  वे सच में मुझे  यहाँ नहीं चाहते  “उसी तरह, आप अपने ह्रदय को पोस्टर से सजाते हो:”. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “, लेकिन जब कृष्ण आपके ह्रदय में प्रवेश करते हैं तो आप उनकी जरा भी सेवा नहीं करते हैं.?!  जैसा कि  वे  ‘गीता’ में कहते हैं: “.बस थोड़ा सा जल , एक छोटा सा फल, एक  पत्ती और मैं संतुष्ट हो जाता  हूँ” अगर हम भगवानको आमंत्रित करते हैं ताकि  हम सेवा में संलग्न हों , तो हमें  सेवा में शामिल होने के लिए तैयार रहना चाहिए. केवल कहना,  यह पर्याप्त   नहीं है . हमें तैयार रहना होगा. यदि हम अपनी इच्छा दे, अगरअपनी इच्छा  हम कृष्ण के लिए दे दें : “हाँ, मैं जुड़ना चाहता हूँ , तो मेरी देखभाल आपके हाथ है ,” तो वे  ख्याल रखेंगे. और भूलो  नहीं कि यह  है, नि: स्वार्थ समर्पण एक आनंद है. यह सबूत आप न केवल किताबों में पढ़ सकते हैं, बल्कि यह सबूत आप भक्तों के चेहरे पर पढ़ सकते हैं.
एक बार किसीने  एक शिक्षक से पूछा: “यह कैसे हुआ कि पवित्र नाम का मीठा अमृतमेरे होठों पर कड़वाहट  में  बदल गया है?” तो शिक्षक ने कहा: यह केवल पवित्र नाम ही नहीं है .”अगर कुछ बदला जा सकता है, अगर  मैं  कुछ  अनुभव करता हूँ  और फिर मैं इसे खो देता हूँ  – तो यह एक वास्तविक अनुभव नहीं था. आरम्भ , बदलाव , समाप्ति  – यह हमारी समझ के अनुसार भौतिकता  है .लेकिन आध्यात्मिक बातें  स्थायी, शाश्वत और सदा बढ़ती जाती हैं.. और कभी -कभी हमें फिर से  यह सोचना चाहिए – हमने  क्या देखा है, हमने  क्या हासिल किया है, कितना हम समझ चुके हैं, कितना हमने  आत्मसमर्पण कर दिया है. क्योंकि दस प्रतिशत आत्मसमर्पण द्वारा आपको नब्बे प्रतिशत परिणाम प्राप्त नहीं होगा, है ना? कृष्ण एक अच्छे  व्यापारी है. लेकिन सौभाग्य से आपके एक अधिकृत डीलर है और ये चैतन्य महाप्रभु हैं . आप केवल दसप्रतिशत भुगतान करते हैं और आप को एक सौ  आठ प्रतिशत लाभ मिलता है. क्योंकि वे  दया के  वितरक है. इसलिए कृपया, मंदिर के लिए अपने समर्पण का कुछ दस प्रतिशत लाओ  और इसे उनके  कमल चरणों में चढ़ा दो. तुम्हे इससे  कई गुना अधिक मिलेगा .

(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६  .०२ .२००७ , सोफिया )  समय के तीन चरण, अतीत, वर्तमान और भविष्य हैं. और हालांकि हम इन तीन चरणों की बात करते हैं, वे वास्तव में मौजूद नहीं है. क्या आपका कोई  अतीत है? नहीं,विगत चला गया है, इसलिए यह अस्तित्वहीन है . भविष्य  अस्पष्ट है. इसलिए यह है नहीं. यह केवल वर्तमान क्षण है, लेकिन जब मैं कहता हूँ “वर्तमान क्षण”, यह पहले ही चला गया है. हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं: कुछ होता नहीं  है. इसलिए समय नहीं है.क्या  समय है? अचिन्त्य  भेदाभेदा  तत्त्व  – हाँ और नहीं भी – एक साथ  . निरपेक्ष भाव में समय मौजूद नहीं है, अभी हम देखते हैं कि समय यहाँ है  और गुजर रहा है. कई लोगों का कहना है कि समय गुजर रहा है, जबकि समय हँस रहा है और देखता है कैसे मनुष्य गुजर रहे हैं.
हमें समझना चाहिए कि समय ,परम  प्रभु की  एक ऊर्जा है और यह एक समाप्त होती ऊर्जा के रूप में भौतिक मंच पर प्रकट होता   है. समय इस तरह का  एक कारक  है जो कि चीजों के घटने  का  अनुक्रम प्रदान करता है. वर्तमान अतीत का भविष्य और   भविष्य का अतीत  है. यदि आप वर्तमान क्षण को समझ लेते हैं तो  आप भूत और  भविष्य को समझ लेते  हैं. यदि आप को वर्तमान क्षण का पूरा ज्ञान है, तो आप समझ सकते हैं कि क्या चला गया है और क्या आने वाला है . हमने  यदि एक उचित तरीके से  अपने  समय का उपयोग किया है. और अगर हम भगवान की स्तुति के लिए इस  वर्तमान क्षण का उपयोग करें, तो हम अतीत जानते हैं और हमें भविष्य का भी  पता है. इसलिए यह  स्थायी वचनबद्धता होनी चाहिए. समय क्या है,इसे समझने के विभिन्न स्तर हैं.फिर भी कुछ स्थाइत्व होना चाहिए. कृष्ण-सेवा में स्थायी  वचनबद्धता का अर्थ है  पूर्ण अनुराग. पूर्ण अनुराग,पूर्ण स्वतंत्रता के साथ  क्यूंकि  पूर्ण वचनबद्धता संसार के विभिन्न संस्थानों में मिल सकती है.जैसे कि आप सेना में भारती हो जाते हैं तो वे आप को पूरा काम देते हैं . या फिर आप यदि जेल में है तो भी आप व्यस्त हैं -पूर्ण रूप से . और यदि आप लोहे की सलाखों के दूसरी ओर हैं – माया का बंदीगृह – तब यह स्वतंत्रता खलती है-तब भी आप पूरी तरह से बंधे हुए हैं ,हम हर समय व्यस्त हैं .लेकिन साधारण व्यस्तता और धार्मिक  व्यस्तता भिन्न हैं. इन संस्थानों द्वारा दी गयी व्यस्तता जबरदस्ती की है. आपको आदेश मिलता है और आपको उसका पालन करना है .भ्रम छली होता है,वह इस तरह से आदेश देता है की आप खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं.तुम्हें लगता है कि “मैं कर सकता हूँ! मैं इस तरह या उस तरह का चुनने के लिए  मुक्त हूँ. “लेकिनवास्तव में हम प्रकृति की शक्तियों द्वारा संचालित होते  हैं और भ्रम का जादू हमें चला  रहा होता है. इसलिए केवल बल द्वारा या इस जादू से जुड़ा होना पर्याप्त नहीं है. हमें  अपनी स्वतंत्र इच्छा से जुड़ना  है. हमें  ‘हां’ कृष्ण को कहना है. यदि सेवा बल द्वारा हासिल की गयी  है, तब हमारा  “ध्यान” इस पर होगा कि किस प्रकार इस वचनबद्धता को तोड़ दिया जाए. लेकिन अगर हम कहें और हम सहमत हैं: “हाँ! मैं करना चाहता हूँ! में यहाँ रहना चाहता हूँ मैं मदद करना चाहता हूँ, मुझे क्या करना है? बताइए  “तो अगर हम उचित आदमी हैं, तो हम यह कर जाएगें . पूर्ण वचनबद्धता  के साथ पूर्ण स्वतंत्रता: यह  भक्ति सेवा में सबसे अच्छासंयोजन है. कृष्ण के विचारों, गतिविधियों, शब्दों में स्थायी वचनबद्धता  – अतीत, वर्तमान और भविष्य में. जब भी आप मुसीबत में हो या  खुशी होती है, तुम बाहर कॉल कर सकते हैं: “जय  राधे श्याम!” स्थिति बदल जाएगी. दुख चला जाएगा. और खुशी भी चली जायगी ? नहीं ,खुशियाँ  बढती जाएँगी.भगवान के पवित्र नामों के  जप से ,  वह सब कुछ ,जो अशुभ है, दूर हो जाता है. कई लोग  अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं. आपको  पता है कि आपका  अतीत आपके  बाएं हाथ पर लिखा हैऔर आपका  भविष्य  आपके  दाहिने हाथ पर लिखा है. लेकिन अगर आप अपने अतीतऔर अपने भविष्य को बदलना चाहते हैं, तो एक सुझाव है. बस ताली बजें ,जब एक कीर्तन होता है. क्योंकि तब आपकी हथेलियों की रेखाएं बदल जाएंगी और वह सब कुछ ,जो अशुभ है,वह दूर हो जाएगा .भगवान की सेवा में स्थायी लगन   – यही  भक्ति योग का लक्ष्य है.  व्यस्तता केवल बलपूर्वक नहीं  ,बल्कि  मुक्त समर्पण द्वारा हो . “मैं यहाँ हूँ, मुझे आपकी सेवा में संलग्न होना  है .” हरे कृष्णमहामंत्र एक निमंत्रण की तरह है. जब आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, एक अतिथि की तो आप एक अच्छा पोस्टर बनाते हैं, अपने प्रवेश द्वार को सजाते हैं  और  कहते हैं “आपका स्वागत है!” तो फिर आपका  मेहमान आता है और आप  उसे एक  कप पानी भी नहीं  देते.  अतिथि को  कैसा लगेगा? वे  कहेंगे: “ठीक है, यह एक बहुत अच्छा आमंत्रण है, लेकिन बहुतखराब सत्कार . बेहतर है कि मैं चल जाऊं.  वे सच में मुझे  यहाँ नहीं चाहते  “उसी तरह, आप अपने ह्रदय को पोस्टर से सजाते हो:”. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “, लेकिन जब कृष्ण आपके ह्रदय में प्रवेश करते हैं तो आप उनकी जरा भी सेवा नहीं करते हैं.?!  जैसा कि  वे  ‘गीता’ में कहते हैं: “.बस थोड़ा सा जल , एक छोटा सा फल, एक  पत्ती और मैं संतुष्ट हो जाता  हूँ” अगर हम भगवानको आमंत्रित करते हैं ताकि  हम सेवा में संलग्न हों , तो हमें  सेवा में शामिल होने के लिए तैयार रहना चाहिए. केवल कहना,  यह पर्याप्त   नहीं है . हमें तैयार रहना होगा. यदि हम अपनी इच्छा दे, अगरअपनी इच्छा  हम कृष्ण के लिए दे दें : “हाँ, मैं जुड़ना चाहता हूँ , तो मेरी देखभाल आपके हाथ है ,” तो वे  ख्याल रखेंगे. और भूलो  नहीं कि यह  है, नि: स्वार्थ समर्पण एक आनंद है. यह सबूत आप न केवल किताबों में पढ़ सकते हैं, बल्कि यह सबूत आप भक्तों के चेहरे पर पढ़ सकते हैं.एक बार किसीने  एक शिक्षक से पूछा: “यह कैसे हुआ कि पवित्र नाम का मीठा अमृतमेरे होठों पर कड़वाहट  में  बदल गया है?” तो शिक्षक ने कहा: यह केवल पवित्र नाम ही नहीं है .”अगर कुछ बदला जा सकता है, अगर  मैं  कुछ  अनुभव करता हूँ  और फिर मैं इसे खो देता हूँ  – तो यह एक वास्तविक अनुभव नहीं था. आरम्भ , बदलाव , समाप्ति  – यह हमारी समझ के अनुसार भौतिकता  है .लेकिन आध्यात्मिक बातें  स्थायी, शाश्वत और सदा बढ़ती जाती हैं.. और कभी -कभी हमें फिर से  यह सोचना चाहिए – हमने  क्या देखा है, हमने  क्या हासिल किया है, कितना हम समझ चुके हैं, कितना हमने  आत्मसमर्पण कर दिया है. क्योंकि दस प्रतिशत आत्मसमर्पण द्वारा आपको नब्बे प्रतिशत परिणाम प्राप्त नहीं होगा, है ना? कृष्ण एक अच्छे  व्यापारी है. लेकिन सौभाग्य से आपके एक अधिकृत डीलर है और ये चैतन्य महाप्रभु हैं . आप केवल दसप्रतिशत भुगतान करते हैं और आप को एक सौ  आठ प्रतिशत लाभ मिलता है. क्योंकि वे  दया के  वितरक है. इसलिए कृपया, मंदिर के लिए अपने समर्पण का कुछ दस प्रतिशत लाओ  और इसे उनके  कमल चरणों में चढ़ा दो. तुम्हे इससे  कई गुना अधिक मिलेगा .



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