Archives

Calendar

October 2022
M T W T F S S
 12
3456789
10111213141516
17181920212223
24252627282930
31  

Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




अतीत, वर्तमान और भविष्य – ये   प्राणियों की परिवर्तित  परिस्थितियां हैं.फिर भी वहाँ कुछ स्थायी है. वह  स्थायित्व क्या है?  अगर हम अस्तित्व पर ध्यान केन्द्रित करते हैं –उसका आरंभ,रखरखाव और अंत-इसमें कुछ स्थायित्व है और वह स्थायित्व क्या है ?उदाहरण के लिए, एक शरीर ले – हम पैदा होते हैं, हम जी  रहे हैं, हम मर रहे हैं पर कुछ तो स्थायी है.यह स्थायित्व क्या है? यह है आत्मा.और इस आत्मा को कैसे अनुभव करें?कैसे इसे पकड़ सकते हैं? हम लक्षण द्वारा आत्मा की पहचान कर सकते हैं. लक्षण क्या हम देख सकते हैं? जीवन वहाँ है, लेकिन जीवन ही नहीं अनुभव कर सकते हैं. जीवन मौजूद है, लेकिन वह खुद को नहीं समझ सकता. इसके अलावा भी कुछ और है और वह है चेतना . चेतना खुद के लिए खोज कर सकते हैं. वहाँ कोई है, जो खोज है, जो समझने की कोशिश कर रहा है होना चाहिए. और अगर वहाँ इस चेतना है, चेतना देखते हैं, कर सकते हैं अपने मूल का पालन कर सकते हैं – यह अस्तित्व है. एक अर्थ में हम कह सकते हैं कि अस्तित्व चेतना के अतीत है. यदि अस्तित्व चेतना के अतीत है, तो चेतना का भविष्य क्या है?अस्तित्व  अतीत है अर्ताथ यह है मूल.चेतना का मूल अस्तित्व है .भविष्य क्या है ,चेतना का लक्ष्य क्या है?आत्मा को सिद्ध करना .और फिर क्या होता है?हम ईश्वर के पास  लौट  जाते हैं.किस रूप में?किस अवस्था में?आप गोलोक वृन्दावन में जाते हैं?दुखी हो कर,मूंह लटकाए हुए?ठीक है,हमें नहीं पता किहम आध्यात्मिक नभ में कैसे प्रवेश करेंगें.पर इस पर ध्यान दें.   “भगवद -गीता ” में कहा गया है कि इस  प्रक्रिया का अभ्यास  ख़ुशी से किया जाता है. सुसुखं  कर्तुम  अव्यय  –  प्रक्रिया का अभ्यास  आनंद से किया जा सकता  है. और यह हमें आत्मा के मूल आनंद के निकट लाएगा. तो हम कह सकते हैं कि भविष्य, या चेतना का लक्ष्य , आनंद है, आनन्दम. सत अस्तित्व है-हमारा अतीत है ,यह हमारा स्रोत है. हमारी पहचान, चित , चेतना -खोज रहा है, अपने आपको , अपने होने को .अपने लक्ष्य को और चेतना का लक्ष्य है आनंद, खुशी, आनन्दम.
यह बताता भी है और अलग श्रेणी भी पता चलती है- आध्यात्मिक विकास के  विभिन्न चरणों की स्वीकृति . क्योंकि पहले हमें  खुद को चेतना के रूप में में पहचानना है  – मुझे लगता है, इसलिए मैं हूँ. जैसे डकार का कहना था’““Cogito ergo sum”मुझे लगता है ,अत:मैं हूँ- सौ सालों तक इस दर्शन पर बने रहने के बाद वे इस नारे को कैसे बदल सकते हैं?   “Dubito ergo sum – “मुझे संदेह है ,इसलिए मैं हूँ.” यह भौतिक दशा  है. तुम अपने आप को काम पर शक करके अपनी  पहचान करोगे . जरा कल्पना करो कि यह किस तरह की पहचान है: मुझे शक है, इसलिए मैं हूँ.यह मेरा स्वभाव है, मुझे शक हो रहा  है, यह है कि मैं क्या हूँ, मैं  शक कर रहा हूँ. मैं एक बड़ा प्रश्न चिह्न हूँ. तो मैं वैष्णव तिलक  इस तरह नहीं लगाता हूँ , बल्कि  एक प्रश्न चिह्न के तरह लगाता हूँ.यह मेरी पहचान है. यह मेरा  संप्रदाय है – यह प्रश्न चिह्न है.
बौद्धिक विधि से  हम अस्तित्व के बारे में थोडा सा जान सकते हैं , इस बारे में नहीं जान सकते.. तो हमे  बहुत बुद्धिमान होना चाहिए यह समझने के लिए यह वह मार्ग नहीं है और इसे पाने के लिए है  विश्वास, गहरी आस्था तरीका है –यह समझने के लिए की  क्या खुशी है, क्या है आनंद . और, अगर हम गहरे विश्वास के भगवान के नाम का जप करते है तो निश्चित रूप से हमारी चेतना बदल जाएगी . इस जादुई कालीन प्रभाव है. तुम कालीन पर बैठते हो  और जब  मंत्र का जाप शुरू करते हो , तो तुम  बस उड़ रहे हो . यह तुरंत तुम्हें  चेतना के एक अलग स्तर पर ले आता है .
वैसे भी, चेतना हमारी पहचान है, यह है कि हम क्या अनुभव कर सकते हैं. इसलिए यह  खोज भी एक सचेत खोज है, यह शुरू में एक बौद्धिक खोज है. अगर हम मुड कर देखें , हमारे स्रोत खोजने के लिए, हमारे अतीत को खोजने की कोशिश करें तब एक बौद्धिक खोज, एक उचित खोज का उपयोग करें. यह अस्तित्व को समझने के लिएरास्ता है. और आनन्दम को  समझने के लिए रास्ता क्या है? हमें  एक ही तर्कसंगत पद्धतिलागू करनी  चाहिए? आह, यह एक काव्यात्मक  सवाल है. एक ही विधि काम नहीं करेगी  क्योंकिआनन्दम तर्कहीन है. तो क्या हम दूसरी विधि लागू कर सकते हैं?  हम भविष्य और चेतना के लक्ष्य के शोध के लिए कौन सी विधि प्रयोग कर  सकते हैं? मैं कहूँगा, हमें  विश्वास के साथ हमारे लक्ष्य की खोज करनी चाहिए. अगर हम अनुसंधान की विधि के रूप में विश्वास का प्रयोग करते हैं ,उस विधि के रूप में ,जिसमें शोध किया जा सकता है तो हमेंआध्यात्मिक प्रसन्नता  मिल जाएगी.
आनंद – यह अस्तित्व की पूर्ति है. हम कह सकते हैं कि अस्तित्व  की सर्वोपरि  उपलब्धि चेतना है, और चेतना का  शीर्ष अनुभव आनंद है. हमेशा श्रद्धालुओं कि संगत में रहने का प्रयत्न करें ,स्वयं को सेवा में समर्पित कर दें ,अपने आध्यात्मिक मास्टर के निर्देशों का पालन करें ईश्वर की आराधना करें और आपको परिणाम दिखाई देने लगेंगे.


Leave a Reply