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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ. क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से ,२५ मई २००६ , सोफिया )
श्री गुरु हमारे सबसे अच्छे मित्र हैं …सदैव हमारी भलाई के लिए कर्मरत,प्रार्थना में लीन हैं |गुरु की एक ही इच्छा होती है कि उनके शिष्य पूर्णत्व को ,ईश्वर के शुद्ध प्रेम को प्राप्त करें | अतः गुरु हैं पथ और लक्ष्य है कृष्ण |
काफी लोग सोचते हैं कि आध्यात्मिक मास्टर स्वीकार करने का अर्थ है कि उन्होंने काम पूरा कर लिया है |पर यह तो केवल एक शुरुवात भर है |अधिकतर हम अपने अध्यात्मिक मास्टर को अपना इष्ट -देव मानते है, या यूँ कहें , पूजा की वस्तु मानते हैं , क्यूंकि हम उन्ही की तरह खरा भक्त बनना चाहते हैं | हम उन्ही की तरह का बढ़िया जीवन चाहते हैं | पर शिष्य के जीवन का यह बहुत भ्रम में डालने वाला अंश है | क्यूंकि सन्यासी और गुरु के जीवन के बारे में अधिकतर लोग काफी गलत ख्याल रखते हैं,मैं आपको उसी प्रकार के जीवन जीने की सलाह नहीं दूंगा.. हो सकता है आप में उतनी योग्यता न हो | हो सकता है ,वो जो एक उच्च श्रेणी के व्यक्ति के लिए सहनीय हो, वो आप को वहीँ का वहीँ, उसी क्षण ख़त्म दे |
पर यह स्वाभाविक है कि हम अपने मास्टर की तरह ही होना चाहते हैं | ओ गुरुदेव ! आपके ह्रदय की धड़कन रासलीला की ताल की भांति है | हम अपने मास्टर में हर प्रकार की सुन्दरता और हर प्रकार की आध्यात्मिक चीजें पाना चाहते हैं | वे हमारे आदर्श है,पर उनकी नक़ल नहीं करो | सेवा करने का प्रयत्न करो,अनुकरण करने का प्रयत्न करो ..क्योंकि वो उनका जीवन है और यह तुम्हारा जीवन है | अत: अपनी जिन्दगी उसी गहराई से जिओ जैसे गुरुदेव अपना जीवन जी रहे हैं | तब तुम अपने जीवन की सर्वोच्च ऊँचाइयों पर पहुँच जाओगे | शायद यह अलग सा है,पर आप,इसे इस तरह सबसे अच्छे तरीके से निभा सकते हैं|
तब भी आध्यात्मिक मास्टर अति महत्वपूर्ण है | ज्यादातर लोग सोचते हैं,कि ईश्वर दूर है ,पर गुरु बहुत निकट हैं | अत: गुरु का मतलब है -संपर्क |वो हमें परम सत्ता से जोड़ते हैं | अगर भगवान अपने स्थान पर रहते हैं और मैं ,अपनी जगह पर रहता हूँ, तो आप संपर्क कैसे साधेंगे ? बल्कि ,अगर आपके और उसके बीच में कोई खड़ा है , आप दोनों के हाथ पकडे हुए , तो वह संपर्क साध सकता है | इसलिए,गुरु हमें अलग नहीं करते ,बल्कि वे हमें जोड़ते हैं | गुरु हमें सिर्फ हमारे झूठे अहम् से अलग करते हैं |
गुरु सिर्फ उनके लिए हैं ,जो इस सांसारिक अस्थिर जीवन से मुक्त होना चाहते हैं | केवल उनके लिए,जो घर वापिस जाना चाहते हैं,वापिस भगवान के पास | उनके लिए नहीं,जो अपना अधिक से अधिक जीवन यंही बिताना चाहते हैं | इस प्रकार इससे हम यह समझ सकते हैं कि हलांकि गुरु एक व्यापक मर्यादा हैं , तब भी वे सबके लिए नहीं हैं | यदि हम आदेश मानने को तैयार नहीं हैं तो .इसका अर्थ है कि गुरु हमारे लिए नहीं है |
मैं ये मानता हूँ कि सजीव ( लिविंग) गुरु को मानना आसान काम नहीं है. क्यूंकि वे मुझे कुछ ऐसा बता सकते हैं,जो मुझे करना ही पड़ेगा | यदि मेरे गुरु केवल एक तस्वीर हैं .दीवार पर टंगी हुई या ताक पर रखी हुई –कभी ऊपर ,कभी नीचे होती हुई ,मैं ऐसा होते देख चुका हूँ —तब वे (गुरु) हमारी जिन्दगी में कोई रूकावट नहीं देंगें | हम अपनी जिन्दगी , जैसे चाहें वैसे जी सकते हैं.
खैर ,मैं इस दृष्टिकोण की आलोचना भी नहीं करना चाहता ,पर इसकी पराकाष्ठा तब होती है,जब कोई इस प्रकार के “ गुरुइज्म ” में फंस जाता है |यह एक अलग प्रकार की विशेष सनक है,जो आध्यात्मिकता का बाना ओढ़े है | अत: हमें इस नियम को ठीक प्रकार से समझ लेना है |वैसे भी ये आसान है — कृष्ण ने गुरु हमारी सहायता के लिए दिए हैं |गुरु ईश्वर का कार्य है,दैवीय कार्य |
अंतत:, आध्यात्मिक मास्टर एक पथ-प्रदर्शक की तरह हैं |अगर आप किसी अनजान जगह पर जाना चाहते हो तो आपको कुछ अलग तरह के तरीके अपनाने पड़ेंगें |जो जगह आप जानते नहीं हैं ,उसे जानने के तीन तरीके हैं | नकशा देखो, जो जानता हें,उससे पूछो या आपको स्वयं जानकारी हो | गुरु तो एक ऐसे गाइड हैं ,जो आपका मार्गदर्शन कर सकते हैं |यदि आप का प्रवेश होता है असीम आकाश में ,गोकुल वृन्दावन में, तो आप खुद को खोया हुआ पाते हैं, “मेरे लिए यह नई जगह है !मैं कहाँ जाऊं ?” तभी आपको दिखाई देता है “ओ !यहाँ तो गुरुदेव हैं !मैं सुरक्षित हूँ !अब वे मेरा मार्गदर्शन करेंगे |
यह स्वाभाविक है कि हम लम्बे समय तक अपने अध्यात्मिक गुरु की महत्वपूर्ण भूमिका के बारे में बात कर सकते हैं पर यह प्रशंसा/स्तुति संपूर्ण जीवन भर चले |


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