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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६/११/2006, सोफिया )

हम भक्ति योग का अभ्यास कर रहे हैं.भक्ति का मतलब है,दिव्य प्रेम, योग का मतलब है,संबंध. सबको जुड़ना पसंद है.जब हमने इस धरती पर जन्म ले लिया है तो हम जुड़ गए हैं .हम एक ही हवा में साँस लेते हैं,समान साथ पर रहते हैं.एक सी परेशानियों को बांटते हैं.और इस सर्वोच्च आदर्श रूप के लिए हमें जीना चाहिए.
हम जुड़े हुए हैं.और यह जुडाव हम पर प्रभाव डालता है.जरा सोचो,विचार करो–आपके जीवन पर कितने प्रभाव पड़ते हैं?आप अपनी माता के पुत्र और अपने पुत्र के पिता हैं.आप अपनी पत्नी के पति हैं या अपने परिवार के मुखिया .आप देश के सेवक,मित्रों के मित्र,शत्रुओं के शत्रु हैं.हमारे विभिन्न रोल हैं,कितने सारे विभिन्न रोल .हमारा जीवन एक नेटवर्क (जाल) की भांति है.और यह नेटवर्क अलग अलग भूमिका हमारे लिए लाता है.
ये भूमिकाए हमें कुछ संस्कार देती हैं . और हम जुड़े हुए हैं हमारी भूमिकाओं से . यदि आप एक सूची बनाएं कि कैसी अलग अलग भूमिकाएँ और कैसे कई अलग अलग कार्यों से आप जुड़े हैं , यह एक लंबी सूची है. और सोचिए कि अचानक ही आप इस संस्कार को खो देते हैं तो बस लगता है, “मैंने अपने आप को खो दिया है!” जरा सोचो, आप अपने परिवार को खो देते हैं , अपनी नौकरी खो देते हैं आप अपने पहचान पत्र खो देते हैं – अचानक इतनी बड़ी मुसीबत! सामान्य स्थिति में लगता है कि हम इस तरह के हैं , हम ऐसे ही होते हैं, मैं यह हूँ, मैं उस तरह का हूँ – हमारी एक झूठी पहचान है . हम इन भूमिकाओं और नेटवर्क के प्रभाव में हैं. बहुत कम लोगों को उनकी वास्तविक पहचान की खोज के लिए तैयार हैं. और इससे भी बहुत कम लोग अपनी पहचान बदलने में सक्षम हैं.लेकिन एक बुनियादी नियम है. यदि आप एक प्रभाव से बाहर निकलना चाहते हैं, आप को, अपने आप को एक और प्रभाव में डाल देना है. यह एक महत्वपूर्ण संदेश है, कृपया, ध्यान दें ! अगर आप अपने दिल पर,अपने कंधों पर किसी भी तरह का बोझ महसूस करते हैं, यह उन संस्कारों से आता है ,जो आप में हैं . इसलिए इन संस्कार से अपने आप को बचाओ! लेकिन यह तभी संभव है जब आप अन्य साधन/प्रभाव के अधीन हो जाए . पर कड़वे साधन के बजाए मीठे नेटवर्क का चयन करें. भ्रम – या नेटवर्क का अनुकूलन – यह तुम एक छड़ी से सीख सकते हो . कृष्ण भी हमें सिखा सकते हैं , लेकिन उनकी छड़ी में छेद है. उनकी छड़ी उनकी बांसुरी है.
अत; दैविक अनुकूलता के अधीन आ जाएँ .दिव्य प्रभाव के अधीन आ जाएँ !जीवन.. जीवन क्या है? कुछ इसे पथ कहते हैं ,कुछ नदी कहते हैं.यह बहुत आशावादी है . जरा यथार्थवादी बनो . पीडाएं .अधिक निराशावादी कहेंगे : जीवन एक विफलता है. किसी ने मुझे कहा कहा कि दुनिया एक जहाज है जो जल्दी से डूब जाता है . हाँ, बिना दैविक प्रभाव के हमारा जीवन एक विफलता है.. तो, आप अपने जीवन में दिव्य प्रभाव आमंत्रित करें ! हम पीड़ा के लिए पैदा नहीं हुए हैं. अंतत: जीवन एक अवसर है , अनुभव लेने के लिए और हमारे जुडाव व्यक्त करने के लिए . खुद को दुखी करने के बजाए , आप एक प्रसन्न भाव में परम ईश्वर की सेवा कर सकते हैं . अपूर्णता के स्थान पर आप पूर्णता को प्राप्त कर सकें .
जीवन एक देवाधीन कार्य है. हम मेहमान हैं यहाँ. वांछित या अवांछित-मुझे पता नहीं. लेकिन हमें अपने घर की तलाश करनी चाहिए क्योंकि या तो हम घर की तलाश कर रहे हैं या हम घर की याद कर रहे हैं. क्या आपको लगता है कि आप घर पर हैं या आप चाहते हैं कि घर वापस आने का रास्ता मिल जाए, फिर से देवत्व के पास आना चाहते हैं? तो खुद को हवाले कर दो ,एक प्रसन्न भाव से स्वयं को प्रस्तुत कर दो-दैविक संरक्षण में .
अपने जुड़ावों को छोड़ देना मुश्किल है. लेकिन कृष्ण यह जादू कर सकते हैं



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