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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( श्री भ .क .तीर्थ महाराज , “चैतन्य चरित्रामृत”, अन्त्य -लीला , चतुर्थ अध्याय ,पर आधारित व्याख्यान से


२८ मई २००६ , सोफिया )
ज्येष्ठ मास में (मई -जून ), चैतन्य महाप्रभु यमेश्वर(भगवान शिव ) -उपवन में आये और भक्तों की प्रार्थना पर प्रसाद स्वीकार किया | दोपहर ,भोजन के समय सनातन गोस्वामी को प्रभु का बुलावा आया ,उनकी प्रसन्नता इस बुलावे के कारण दुगुनी हो गई |दोपहर में तट की रेत आग की तरह तप रही थी ,लेकिन सनातन गोस्वामी उसी रास्ते से आये | प्रभु के बुलावे से ख़ुशी में डूबे ,सनातन गोस्वामी ने गर्म रेत में पैर जलने की बात नहीं बताई | यद्यपि उनके दोनों पैरों में छाले पड़ गए थे पर वे किसी भी सूरत में चैतन्य महाप्रभु के पास पहुंचे | उन्होंने देखा की प्रभु भोजन लेने के बाद विश्राम कर रहे हैं | गोविंदा ने सनातन गोस्वामी को श्री चैतन्य के बचे हुए भोजन वाली थाली दे दी |प्रसादं ग्रहण करने के बाद , सनातन गोस्वामी प्रभु के पास गए | जब प्रभु ने पूछा ,’ तुम किस रास्ते से आये ?” सनातन गोस्वामी ने कहा ,”मैं तट के पास वाले रास्ते से आया हूँ | : “ तट से क्यूँ आये ,रेत तो बहुत गर्म है सिंघद्वार के सामने वाले रास्ते से क्यूँ नहीं आये ? वंहा तो बहुत ठंडा है | गर्म रेत से तुम्हारे तलुओं में छाले पड़ गए होंगें -अब तुम चल नहीं पा रहे होंगें -तुमने इसे सहा कैसे ?” सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया ,’ मुझे दर्द महसूस नहीं हो रहा ,ना ही मुझे पता है कि गर्मी के कारण मेरे छाले पड़ गए हैं |मुझे सिंघद्वार
से गुजरने का कोई अधिकार नहीं है ,वंहा से भगवान जगन्नाथ के सेवक हर समय आते जाते रहते हैं |अगर मैं उन को छु लूं तो मैं तो बर्बाद हो जाऊंगा ” ये सब विस्तार पूर्वक सुन कर ,चैतन्य महाप्रभु बुहत प्रसन्न होकर ,इस प्रकार बोले , “ मम प्रिय सनातन , यद्यपि तुम इस समस्त ब्रह्माण्ड के मुक्तिदाता हो और जबकि देवता और महान संत तक भी तुम्हें छूकर पवित्र हो जाते हैं , वैष्णव -शिष्टाचारों को समझना और उनका पालन करना ,यह एक भक्त की विशेषता है | वैष्णव -शिष्टाचारों को बनाए रखना भक्त का आभूषण है | यदि कोई शिष्टाचार के नियमों का उल्लंघन करता है ,तो लोग उसका मजाक उडाएँगे, और वह दोनों लोकों से पराजित हो जाएगा , शिष्टाचार का पालन कर के तुमने मेरे चित्त को संतुष्ट किया है|तुम्हारे आलावा कौन ऐसा उदहारण प्रस्तुत कर सकता है ?”
अत: शिष्टाचार का पालन करना भक्त का आभूषण है |हम किस प्रकार के शिष्टाचार की बात कर रहे हैं ?
यह घटना किसी एक्शन – मूवी का विषय हो सकती है क्यूंकि प्रकटत: कुछ नहीं घटता है | लेकिन जब आप गहराई मैं जाते हैं ,तब आप पाते हैं कि आत्म – त्याग , आत्म – विस्मरण जैसे गुण प्रकट हो जाते है ,जब आप प्रभु का निमंत्रण सुनते हैं | सनातन कोई मूर्ख नहीं थे जो अपने आसपास की चीजों का ध्यान नहीं रखें ,क्यूंकि वे एक विद्वान् थे ,वे अच्छी तरह जानते थे कि रेत गर्म थी और उस पर चलना पीड़ा दायक होगा | पर दैविक निमंत्रण मिलने पर उन्होंने सोचा “अरे .मेरे प्रभु मुझे बुला रहे हैं ! मुझे तो दौड़ना चाहिए !” धूप-छाँव,सर्दी -गर्मी ,आसान-मुश्किल..बिना इन सब के बारे में सोचते हुए ,नहीं तो इसका मतलब होगा ,”मैं अभी भी अपने आप के बारे में सोच रहा हूँ ,मैं खुद को भूला नहीं हूँ ” अरे! यह तो थोडा खतरनाक है ,अच्छा होगा अगर हम दूसरे रास्ते से जाएँ” पूर्ण आत्म -विस्मरण का अर्थ है , ” मैं जीउँ या मरूं ,इसका कोई मतलब नहीं है ,मुझे सेवा करनी ही है |
. इस प्रकार का समर्पण भाव का इस प्रकार का स्तर होना चाहिए | पैरों पर कुछ छाले-छोडिए भी iये तो कुछ भी नहीं है ! हमारी ओर से एक छोटा सा त्याग – और यदि हम अनंत पूर्णता को प्राप्त कर सकें ?तो तुम्हारा यह किस प्रकार का लेखा -जोखा है ?” अनंत पूर्णता ! हाँ ! यह विचार मुझे पसंद है ..पर त्याग,थोडा सा त्याग ..यह तो बहुत मुश्किल है !”
हमेशा आत्म – केन्द्रित बने रहने की मूर्खता मत करो| हमें त्याग बलिदान को भेंट चढ़ावे की मानिंद ,कर्म की भांति लेना चाहिए , जैसे की सनातन गोस्वामी कर रहे थे |प्रभु का निमंत्रण उनके लिए,उस थोड़ी सी तकलीफ से ,जो उन्हें रास्ते में होनी थी ,उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण था| और उन्हें मिला क्या ? महाप्रभु ने उनकी प्रशंसा करनी आरम्भ कर दी ,” हाँ ,जो तुम कर रहे हो ,वो ठीक है|शिष्टाचार का पालन करना (ठीक है ) | “ और शिष्टाचार है क्या – सेवा के लिए आप कोई भी जोखिम उठाने को तैयार हैं , यही शिष्टाचार है |इस तरह उन्होंने महाप्रभु को बहुत संतुष्ट किया |


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