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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री  भ . क .तीर्थ  महारज  के शरणागति व्याख्यान माला -३  से उद्धृत , ७
सितम्बर,२००६ ,सोफिया)

दो तत्व है जिन कि हमने  अब तक चर्चा की है – विनम्रता और आत्म समर्पण – यह आप पर निर्भर हैं. और शरणागति  के आखिरी  दो तत्व हैं ,जिन्हें हम कहते हैं, समर्पण के बाह्य उद्देश्य तत्व | यह दृढ़ विश्वास कि सब कुछ कृष्ण ही बनान वाले है, और दूसरा है , भरपूर आस्था है कि वह हमरी  सब  से रक्षा करेगा.|मुझ यकीन है कि तुम इन दोनों के बीच फर्क महसूस कर सकते हो | क्योंकि पहला सिद्धांत: हाँ, वह बनानेवाला है, वह वहाँ है – यह सैद्धांतिक अवधारणा की तरह है. यह समझने की आवश्यकता है है कि वह सभी पेड़ों के पीछे है  … “बस पत्थर का एक टुकड़ा उठाओ , मैं वहाँ हूँ, बस एक पेड़ kato – तुम मुझे वहाँ ढूंढ लोग …” लेकिन इसे व्यवहार में कैसे लानाहै  , यह दूसरा बाग  है – जब आप दृढ और भरपूर विश्वास रखते  है कि यदि आप उसकी सेवा करोगे , वह आपकी  रक्षा करेगा है |
इससे आप अभय, निडर हो जाओगे |. हो सकता है कि मैं कमजोर हूँ. हो सकता है कि मैं शक्तिहीन  हूँ ,सड़क पर लड़ाई में , मैं बलवान  लोगों द्वारा जबरदस्त तरीके स पिता जाऊं , लेकिन मुझे पूरा भरोसा है कि कृष्णा मेरी रक्षा करेगे , मेरी शारीरिक शक्ति के बिना भी , क्योंकि हम एक आध्यात्मिक योजना  पर काम कर रहे
हैं. मजबूतया कमजोर – हम शरीर नहीं हैं|
गहन -विश्वास का अभ्यास कैसे करें?  उसे देखने के लिए ,समझने के लिए,दृष्टि का होना आवश्यक है |इसलिए हम कह सकते हैं कि प्रथम है ,दृढ विश्वास कि सब कुछ ज है ,उसके पीछे कृष्ण ही है | हमें ऐसा सोचने के लिए लगातार अभ्यास करना चाहिए,सदेव खुद को याद दिलाते रहें|”हाँ! कृष्ण हैं,कृष्ण ,यह वही हैं ,यह सब
कुछ उसी का स्वरुप है |” और जब चीजें होने लगती हैं,तो आप उसे आँख से ओझल न होने दें|
मैं कृष्ण को परीक्षण पर  नहीं  रखूंगा |. जीवन  पर्याप्त रूप से जटिल और कठिन है जो कि हमें परीक्षा पर  रखता है | लेकिन हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं: “अब तक मैं कृष्ण की कृपा से बच गया हूँ .” एक तार्किक ढंग से हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि यह भविष्य में भी होगा  और मुझे वास्तव में अपनी  मृत्यु के क्षण तक जीना होगा – उससे  पहले नहीं,उससे ज्यादा नहीं बस तब तक जब तक समय है |कोई परेशानी?हर चीज़ कि देखभाल हो रही है |कभी कभी हम इसे देख नहीं पाते ,कभी कभी हम इसे समझ नहीं पाते |इसलिए हमें सिर्फ दृष्टि को साफ करना है ताकि हम सब ओर कृष्ण को देख पाएं |आप जानते हैं कि इसे कैसे करना है |जप करने से आप की आँख खुल जाएंगी |आप जीवन का गुप्त अतरिक्त सौंदर्य देख पाएँगे ,और वह गुप्त व्यवस्था बी जो सम्पूर्ण अस्तित्व में व्यापक है |अत:आप अपने जीवन को समझ पाओगे, गहन विश्वास क्या है,इसे समझने में यह आप कि सहायता करेगा| जब तक हम नोसिखिए  हैं तभी तक हम कृष्ण की परीक्षा लेते है : “अगर आप मौजूद हैं, तो  अपने आप को दिखाओ!” कभी कभी भक्तों  का व्यव्हार सिर्फ बच्चों की तरह हैं| एक बार एक भक्त  ने निर्णय लिया: “ठीक है, अगर कृष्णा मौजूद है मैं तो बस अपनी आँखें बंद करूंगा  और किसी भी तरह मैं इस अत्यधिक  भीड़ वाली सड़क पार कर लूँगा |” वह सफल रहा, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह कृष्ण के संरक्षण की समझ के लिए एक उच्च सोच  है| विश्वास की कमी के कारण प्रमाण  की जरूरत है| लेकिन यह नोसिखियों  के लिए ही है| जो लोग गहरी आस्थारखते हैं ,वे सबूत के बिना काम कर सकते हैं|वे इन साक्ष्यों के खिलाफ काम कर सकते हैं! इतना ही नहीं “ये सबूत” बिना सबूत हो जाते हैं |  क्या यह  विश्वास है! हर सुबह आप को  “शिक्षा अष्टकम”  मंत्र चाहिए! अंतिम छंद का का कहना है: “आप  मुझ तक आते हैं या नहीं, क्या आप मुझे स्वीकार करें या नहीं, मैं आपका  बिना शर्त सेवक हूँ |

और यदि हम विश्वासी लोगों के साथ जुड़ते  हैं ,तो हमारा विश्वास बढेगा | पर मुझे लगता है कि वास्तविक विश्वास कठनाइयों में ही प्राप्त होता है |

विश्वास का अभ्यास करने हेतु,हम देख सकते हैं या परिक्षण कर सकते हैं ,पर यह सैध्यन्तिक सोच है|दूसरा  मार्ग है  बस उसे अनुभव करें — कैसे कृष्ण मुझे अपनी
हथेलियों में ले जा रहे हैं |उसकी हथेलियों में अपना गाल रखने के लिए |और ज्यादा अच्छी सोच होगी अगर आप सोचें कि आप के गाल पर उसकी हथेली है ,बनिस्पत उसकी हथेली आप के गाल पर |
ये शरणागति के तत्व हैं , आत्म का समर्पण |जो कल्याणकारी है ,उसका अभ्यास करो,अकल्याणकारी को त्याग दो –विनम्र बनो और स्वयं का समर्पण कर दो | फिर बाह्य तत्व-इस का दृढ समझ रखो कि कृष्ण बनानेवे हैं, और यह गहन विश्वास रखो कि वह आपकी रक्षाकरेगा |
नन्द महाराज का छोटा बालक ,उन सभी कि प्रार्थनाओं को सुनेगा ,जो उसकी शरण म आन चाहते हैं ,इन छ: अभ्यासों के द्वारा |

तो अगर आप को यह  प्राप्त करना है कि कि कृष्णा आपकी प्रार्थना को सुने, तो यह तरीका है| इन पद्धतियों के माध्यम से आप गंतव्य तक पहुँच जाएगे|. आपको
रहस्यवादी होने कि आवश्यकता नहीं है , इन पद्धतियों  के द्वारा आप गंतव्य तक पहुँच सकते हैं |यही असली रहस्यवाद है |



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