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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( भ. क . तीर्थ महाराज के व्याखान से उद्धृत २६ .११ .२००६ , सोफिया )

“मनसा देहो गेहो – मेरा मन,मेरा घर ,मेरा शरीर – ये सब मैं आप को अर्पित और समर्पित करता हूँ | आप परम प्रभु हैं | कृपया मुझे अपने दरवाजे पर रक्षक -श्वान ( रक्षा करने वाला श्वान) के रूप में स्वीकार करें |”
यह गीत भक्तिविनोद ठाकुर का विलाप है | वे बहुत स्तरीय लक्ष्य रखते हैं |”मेरा जो कुछ है,वह आप को समर्पित है |मेरा शरीर है ,बुद्धि है,घर है ,सब कुछ आप को देता हूँ| मैं अपने लिए कुछ नहीं रख रहा हूँ |”.
.”सुन्दर शब्द ! हमारा ह्रदय उड़न पर है -हाँ बस यही है ,जो मैं करना चाहूंगा ! पर जब समय आता है और आपको किसी अतिथि को एक सप्ताह से अधिक बुलाना पड़े और उसे सहना पड़े ,तो यह बहुत मुश्किल होने लगता है | “मेरा घर आप के लिए है “– क्या सही में, आप का यही मतलब है ? “मेरा शरीर आपको समर्पित है”–क्या आप को समझ है कि इसका मतलब क्या है?” मैं अपनी बुद्धि अर्पित करता हूँ,मेरा मस्तिष्क अब मेरा नहीं है — आपको समर्पित है |
आप अपना घर अर्पित करते हैं – इसका अर्थ क्या है ? क्या ये ये की आप अपने ही घर में मेहमान होंगे या बहुत हो तो सेवक | अब आप मालिक नहीं हैं |इसलिए भक्तिविनोद कहते हैं ,” मुझे अपने द्वार पर रक्षक-श्वान सम रखें |”श्वान घर में नहीं रहता ,घर से बाहर रहता है |तो यदि हम कृष्ण को अपना घर अर्पित करते हैं — घर से बाहर रहने के लिए तैयार रहो |
हम सभी इस जगत में अतिथि हैं ,तो कोई तो मेज़बान है |वह पोषक कौन है — वह है परमपिता परमात्मा | हम उसके घर में रह रहे हैं |ऐसा नहीं है कि वह हमारे घर में रह रहा है ,बल्कि हम उसके घर में रह रहे हैं |
पहले आप अपना घर प्रस्तुत करते हैं — यह अति सरल है क्योंकि यह बाहरी है | जो हम नहीं है ,उसे पेश करना सरल है | और तब भक्तिविनोद ठाकुर कहते हैं .”पर में तो अपनी देह भी प्रस्तुत करता हूँ |मेरा तो शरीर भी मेरा नहीं है|”यह ज्यादा अपेक्षा वाला त्याग है | शरीर तो हमारे कितने समीप है |अपने आप को अभिव्यक्त करने का यह साधन है |यही है जिसे आप अपना प्रथम अधिकार समझते हो|इस देह पर हमें कितना अभिमान है |प्रस्तुत करना अर्थात आप अपनी समस्त गतिविधियाँ दैविक सेवा में अर्पित करते हो |तो क्या सरल है — घर को अर्पित करने कि बजाये देह अर्पित करना ? यह अधिक मुश्किल है |पर सबसे कठिन तो मन है |
मैं,आपको अपना मन अर्पित करता हूँ |”मन को कैसे अर्पित करें?आप मन को कैसे किसी को अर्पित कर सकते हो ? आप मन को किसी को कैसे समर्पित कर सकते हो? प्रेम की एक परिभाषा है,”मैं तुम्हें बार बार याद करता हूँ |” यह तरीका है अपने मन को अर्पित करने का | “मैं अपने बारे में नहीं ,बल्कि भावात्मक लगाव के कारण ,आप के विषय में सोचता हूँ |” जैसे एक श्वान पट्टे से अपने मालिक से जुड़ा होता है ,उसी प्रकार हमारा मन दैविक प्रेम की जंजीर से कृष्ण से जुड़ा रहना चाहिए |”
“मेरा मन,मेरा घर ,मेरा शरीर,आप को समर्पित है |अपने दरवाजे पर कुत्ते की भांति मुझे रखो |मुझे छोटी जंजीर से बांधे रखोगे और मुझे खाना खिलाओगे और मैं तुम्हारी देहरी पर पड़े रहूँगा |जो तुम्हारा विरोध करेंगें ,उन्हें मैं प्रवेश नहीं करने दूंगा ,बल्कि बाहर ही रखूंगा |”
.श्वान को उच्च श्रेणी का जानवर नहीं मना जाता |पर उससे कुछ अच्छी बातें सीखी जा सकती हैं |उदहारण के लिए ,मालिक के प्रति वफ़ादारी |निसंदेह हमें कुत्ते को सिखाना पड़ता है कि घर का मालिक कौन है |एक बार उस पर काबू पाना पड़ता है |पर उसके बाद उसे पता चल जाता है,”वह है बॉस |”और तब कुछ भी हो,वह उसका पालन करेगा |आप उसे मारें भी तो भी.वह आप से अधिक प्रेम करेगा |तो आप यदि कृष्ण के घर के बाहरवाले श्वान हैं,तो अच्छा व्यवहार न करने पर थोड़ी बहुत सजा पाने के लिए तैयार रहें पर आपको कुछ प्रसाद भी मिलेगा | वे आपका ध्यान रखेंगे |
“और मुझे छोटी जंजीर से बांधे रखोगे” छोटी जंजीर यानि तुम अपने मालिक के नज़दीक हो |एक भक्त के समान पास हो | एक भक्त लम्बे पट्टे पर काम कर सकता है या एक छोटी जंजीर पर भी | पर यदि पूर्ण समर्पण नहीं है तो ,तो कुछ भी सहायक नहीं होगा |मैंने देखा है,हमने वैष्णव-इतिहास में देखा है कि कुछ भक्तों को खुली छूट मिल जाती है –वे जो चाहें ,वो कर सकते हैं |उनके स्वामी इतने सहनशील हैं कि वे उन्हें पूर्ण स्वतंत्रता दे देते हैं |पर तब वे कुछ खास आध्यात्मिक अभ्यास करना बंद कर देते हैं |वे,जो छोटी चेन पर होते हैं ,वे भी ऐसा ही करते हैं |तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपकी चेन कितनी लम्बी या छोटी है ,पर आपके समर्पण का स्तर क्या है ,इस का जरूर मतलब होता है |
” जो तुम्हारा विरोध करेंगें ,उन्हें मैं प्रवेश नहीं करने दूंगा ,बल्कि बाहर ही रखूंगा | भक्तों का बचा-खुचा प्रसाद ही मेरा भोजन होगा | मैं अनंत आनंद से इस अवशेष से दावत करूंगा ! जब कभी मैं बैंठूं या लेटूं ,सारे समय आपके कमल-चरणों पर मैं ध्यान लगाऊँगा |जब भी कभी मुझे पुकारोगे , मैं कूदूँगा और नाचूँगा और आप के पास आऊंगा |यद्यपि मैं अपने जीवन के बारे में बिलकुल नहीं सोचता ,फिर भी मैं हर समय प्रसन्न रहूँगा | मैं सिर्फ तुम्हें ही अपना एकमात्र पालक मानूंगा |”
यद्यपि ये शब्द दूसरे गीत का अनुवाद है,तथापि यदि हम वस्तुत्त:अपना शरीर, अपना मन और घर अर्पित करते हैं तो यही हमारी अवस्था होनी चाहिए | हम ब्रह्मा सम प्रतिष्ठित स्थान के पीछे नहीं भाग रहे हैं ,पर “यदि मुझे दूसरा जन्म लेना ही है ,तो मैं वैष्णव के घर में रहना चाहता हूँ |” मुझे सांसारिक भोग या मोक्ष का आकर्षण नहीं है | मेरी एक ही चाह है — जन्म-जन्मान्तर आपका सनातन सेवक बना रहूँ |”
वस्तुत: भक्तिविनोद ठाकुर इस प्रकार इसलिए याचना करते हैं ताकि हमारे पास जो कुछ है उसके समर्पण द्वारा,इस विनम्र तरीके को सदा याद रखें और समर्पण भाव में जिएँ |



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