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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(भ.क. तीर्थ  महाराज के  व्याख्यान से,25 मई 2006  )
मानव शरीर  की  जैविक  संरचना  , इसे हम जैविक  अहंकार भी कह सकते हैं  –   विभिन्न  तत्वों  ,विभिन्न  साधनों  के  द्वारा  एक  आकार  का  निर्माण  होता  है ,शरीर  बनता है – इसे हम भौतिक  (जिस्मानी )निर्माण कह  सकते  हैं , इस जैविक अवस्था  में सूझबूझ और इन्द्रिय बोध जैसे
कई सारे मनोवेग हैं | यह   प्रकृति की दूसरी सभी चीजों से लगभग मिलता जुलता सा ही है|   उदहारण के लिए जानवर , इसी सिद्धांत के अंतर्गत काम करते हैं – सहज प्रवृति और प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था | पशु भूख लगने पर  मारने के लिए तैयार रहते हैं . .उदहारण के तौर पर ,कुछ खास तरह के जानवर |  मनुष्य तो पशुओं से भी बदतर हैं क्योंकि मनुष्य  भूख न लगने पर भी मारने को  तैयार हैं | .तो आदमी के पास इन वास्तविक सीमाओं  को भंग करने का भी मौका है |
अतः जैविक अहंकार से परे ,मानव  की जैविक बनावट  –हम कह सकते हैं कि –व्यक्ति का सांस्कृतिक अहंकार है  | सांस्कृतिक अहंकार अलग अलग प्रभावों से बनता है :जैसे ,आपका ज्ञान या शिक्षा ,आपकी वे आदतें जो पिता और परिवार से विरासत में मिली हैं और यह सब  नाना प्रकार का होता है,काफी लोगों के लिए यह अलग है और न्यारा है| इस सांस्कृतिक अहंकार के दो स्तर होते हैं  | पहला – विशुद्ध सांस्कृतिक अहम्/दंभ ,जो तनाव को कम करने वाला है  -सारे शरीर में  चेतना के समान व्याप्त  है |यह आपके सारे शरीर में फैला हुआ  है और हम कह सकते हैं कि दूसरा है -बौद्धिक अहम् , जो अधिकतर मस्तिष्क में इकठ्ठा होता है |अगर  आप इस सांस्कृतिक अहम्  को  लेते हैं  , चेतना और बौद्धिक ,दोनों   स्तरों  पर , तब आप इन दोनों के बीच के   अंतर  को समझ सकते हैं | फर्क ये है कि जब आप सर काट देतें हैं तो यह बौद्धिक अहम् ख़त्म हो जाता है.पर अगर आप हाथ काट देते हैं तो भी सांस्कृतिक अहम् बना रह सकता  है. क्योंकि बौद्धिक अहम् केन्द्रित है (एक जगह जमा हुआ है ) लेकिन सांस्कृतिक अहम् फैला हुआ है |  पर,निसंदेह , हमारे ऊपर कुछ प्रभाव  हैं ,हमारी अपनी भावनाएं और यादें हैं साथ ही  और भी बहुत सी विविध चीज़े हैं ,जो इस सांस्कृतिक अहम् के साथ जुडी हैं.
इसके बाद हमारे अहम् का अगला स्तर आता है..और हम कह सकते हैं कि वो है…अध्यात्मिक अहम्,जो  वास्तविक है और जो बदलता नहीं है | हमारे अस्तित्व  के दूसरे सभी  स्तर समय -समय पर बदल जाते हैं ,पर यह अध्यात्मिक पहचान बदलती नहीं है |अतः यह वास्तविक अहम् ,यह वास्तविक पहचान -यदि इसे हम सच में समझ लेते  हैं ,यदि हम उस मूल चेतना को पुनः जीवित  कर लेते हैं ,तो हम अपने जीवन के लक्ष्य के बहुत निकट आ सकते हैं |
मानव संरचना  का यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण है क्यूंकि हमें अपने आप को एक खास पैमाने पर पहचानना है | हमें केवल  शारीरिक स्तर पर अपनी पहचान नहीं बनानी  है क्योंकि सभी जानवर ऐसा ही करते हैं| यदि हम भी ऐसा करते हैं तो हम भी जानवर ही हैं,पर  दो पैर वाले |मानव को कुछ और ज्यादा करना है ,कुछ ज्यादा प्राप्त करना है | मानव जीवन ज्यादा ऊँची  उपलब्धियों के लिए है   और इन   ऊँची  उपलब्धियों  का  मतलब है कि आप अपनी देह  को  अध्यात्म के करीब लाएँ ,अपनी चेतना को आध्यात्म से जोड़ें | आप  , अपने आप  की और अपने व्यक्तित्व की  चरम  और अंतिम पहचान तक पहुंचे |
:इस विषय का एक वाक्य में सार है : झूठा अहंकार गलत है वास्तविक अहम् अच्छा है |  सरल शब्दों में यही   कहा जा सकता है  और  इस  झूठे  प्रतिबिम्ब से हमें असली की ओर पहुचना है| आत्म बोध का यही  लक्ष्य है-शारीरिक  स्तर  से अध्यात्मिक स्तर तक पहुंचना, भौतिकता से आत्मा की ओर पहुंचना  ,अपने आप  (स्व) से(ऊपर उठ कर )  ईश्वर की ओर  पहुंचना | परिवर्तन की यह अवधि छोटी भी हो सकती हें,बड़ी भी.लेकिन यदि हम सही में समझदार हैं तो हमें इस मार्ग को जितना संभव हो उतना  छोटा ओर तेज बना लेना है.
क्यों ? क्योंकि इस बीच एक छोटी सी समस्या आजाती है- इसे  पीड़ा/कष्ट कहते हैं | अत: यदि आप बुद्धिमान हैं तो आप कष्ट उठाना नहीं चाहते हैं |
खुद को  अंतिम पर  सर्वोच्च  अध्यात्मिक    मंच पर  पांए   और तब आप  देखेंगे  कि चीजें उसी सर्वोच्च स्तर  से ही निश्चित  होती हैं | यदि आप आत्मा और भाव के स्तर पर  सुदृड़ हैं ,स्वस्थ हैं,तब आपके  अस्तित्व के  निम्न स्तरों  जैसे -सांस्कृतिक अहंकार,बौद्धिक अहंकार ,ओर जैविक अहंकार  ,सभी का सरलता  से सामंजस्य   हो  जाएगा   |  अतः  हमारे पास सब रोगों की एक  एक साधारण पर   चूक दवा है  और वो है -हरे कृष्ण


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