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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भक्ति कमला तीर्थ महाराज के व्याख्यान से , २ सितम्बर ,२००६ सोफिया )
प्रार्थना दूसरों के हित के लिए होनी चाहिएं ,किन्तु यदि आप को कोई परेशानी है तो इसे उस के साथ बाँटने को तैयार रहें | मेरे विचार से आपको यह करना चाहिए | कभी कभी ,अचानक कुछ हो जाता है और आप चिल्लाने लगते हैं : “हे मेरे भगवन !” ऐसा ही है ना ,यहाँ तक कि
नास्तिक भी ऐसा ही कहते हैं | कभी कोई दुर्घटना हो जाए तो वे भी रोते है : “ओ , जीसस क्राइस्ट!”
यह एक स्वाभाविक बात है |. मूलत: हम जुड़े हुए ही है ,हमारा स्रोत वही है |यह स्वाभाविक ही है कि आत्मा विश्वास रखती है और यह भी स्वाभाविक है कि जब आप परेशानी में होते हैं तो आप सिर्फ रोते हैं : “अरे ,मेरे भगवन,मेरी मदद करो :”पर जब आप खुश होते हैं ,तब उसे भूलें नहीं | ठीक है ! क्यूंकि जब आप खुश होते हैं तो आप कभी कभी(बहुत कम ) रोते हैं |: हे मेरे प्रभु ,धन्यवाद “. हमें स्वार्थी नहीं होना चाहिए |हम अपनी परेशानियाँ उस पर डालना चाहते हैं , का यह आपका काम है ,आप संभालो ”,.”पर जब खुशियाँ आप के पास हैं तो “मैं खुद संभल सकता हूँ “
यही मानव स्वाभाव है | अत:जब हम आनंद लेने की मानसिकता की बात करते हैं ,तब हमें एकतरफा नहीं होना चाहिए : हम सिर्फ आनंद का मजा लेना चाहते हैं | आपको मुश्किलों का भी मजा लेना चाहिए |
फिर भी …..संत आपके मार्ग को सहज बना रहे है ,शास्त्र.. मार्ग दिखा रहे हैं तथा कृष्ण आपको बुला रहे हैं | तब हमें क्या समस्या हो सकती हैं ?यह केवल विश्वास की कमी है | कृष्ण की माहिम अपरम्पार है ,ऐसा कहा जाता है तथा वे अपनी महिमा का अपने भक्तों पर कल्पनातीत रूप में अभ्यास करते हैं| तो यह न सोंचें कि उनकी दया किस रूप में प्राप्त होगी,बस उसे ग्रहण कर लें | हम खुश होते जब उनकी दया हमारे स्वभावानुसार मिल जाती है | पर जब दया उनके स्वभानुसार मिलती है ,तो उसे संभालना अधिक मुश्किल हो जाता है |
ईश्वर महान ही नहीं वरन स्नेही भी है | वह प्रेमपूर्ण है और बहुत लोग उन्हें प्यार भी करते हैं |अतएव , अंतत:हमें उस स्थान पर पंहुचना चाहिए ,जहाँ हमें यह समझ आ जाए कि प्रथम दृष्टि में जो हमारा ध्यान आकर्षित करते हैं वे ये स्नेही ईश्वर नहीं हैं ,वरन वे लोग हैं ,जो उन्हें टूटकर प्यार करते हैं – वे हैं हमारे मास्टर |क्या आप अंतर को देख पा रहे हैं ? यह बहुत बड़ा अंतर है | .
क्यूँ ? क्यूंकि उन्हीं से हम सीख सकते हैं कि उसे कैसे प्यार करें ?निसंदेह ,यदि आप का ध्यान उन पर हैं तो उनसे आप सीख सकते हो,कि उनके सेवकों से किस प्रकार स्नेह किया जाए | . फिर भी ,यह एक अच्छा मेल हैः आप किसी भी दिशा से आरम्भ करें ,जिस किसी हिस्से से प्रारंभ करें ,आप को परमपिता परमात्मा के प्रति इस भावात्मक सोच तक पहुंचना ही चाहिए |


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