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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भक्ति क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से , २ सितम्बर २००६, ,सोफिया )
प्रार्थना के लिए अलग अलग तरीके होते हैं |बहुत लम्बे समय तक हम अपने लक्ष्यों,महत्वकांक्षाओं ,इच्छाओं की पूर्ति करने की तलाश में रहते हैं- वे बहुत साधारण होती है- गलत हों ,ऐसा जरूरी नहीं है | प्रथम दार्शनिक व्याख्यान से,आप समझ गए होंगें कि किसी स्वार्थ भाव से कृष्ण की उपासना करना ठीक नहीं है |ऐसे में आप एक मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति बन जाते हैं -आप कहते हैं कि असंख्य चीजें पूरी हो जाएँ ,पर आप जानते हैं कि यह मना है और ऐसी प्रार्थना करना बहुत बुरा है | है न ?:इस प्रकार के योग का अभ्यास करने पर आप अपने , एक जोरदार,सेहतमंद स्वाभाव की जगह , एक विक्षिप्त इन्सान बन जाते हैं -इस इक्कीसवीं सदी के | क्या आप यही चाहते हैं ? शायद नहीं | क्या इससे सहमत हैं ? हम स्वस्थ और बलवान बनना चाहते हैं |हमें अपने स्थान का पता होना चाहिए | यदि मुझे अभी भी कृष्ण कि सहायता की आवश्यकता है तो मैं किसकी ओर जाऊं ,किससे प्रार्थना करूं ? हमें सिर्फ और सिर्फ उससे प्रार्थना करनी चाहिए |
. प्रार्थना से स्वयं को रोकने कि कोशिश कर, अपने पर भार मत डालो | अगर तुम्हें कुछ चाहिए ,तो बस बता दो | पर सब कुछ अपनी जेब में मत डालो | जो कुछ भी तुम्हें मिला है ,उसे दूसरों के साथ बाँटने के लिए तैयार रहो |
प्रार्थना कैसे करें ,यह हमें सीखना चाहिए | प्रार्थना
के कई प्रकार होते हैं (प्रार्थना कई प्रकार की होती हैं )जैसे आशीर्वाद मांगना ,क्षमा मांगना और आखिर में जब जब आप प्रार्थना के वास्तविक स्थान (मंच )पर आ जाते हैं तब आप ईश्वर की महिमा का गुणगान करने लगते हैं |
यदि आप शरण में हैं तो इसका अर्थ है कि कोई तो है हम जिसके पास जा सकते हैं| जितनी भी कठिनाइयाँ या खुशियाँ हों ,आप के पास एक सलाहकार और साझेदार है | तो ,कृष्ण आपकी सेवा के लिए तैयार हैं ,पर आप उनकी सेवा के लिए कितना तैयार हो ? आप सीधी सादी प्रार्थना कर सकते हैं :हे मेरे प्रभु ,मुझे लगता है कि मुझे इसकी जरूरत है –लेकिन आप की क्या राय है ?” यह एक महत्वपूर्ण भाग है क्यूंकि तब आप खुल कर कह सकते हैं :मुझे इसकी जरूरत है ,मुझे आपकी सहायता चाहिए |”तो घबड़ाओ नहीं :क्या मैं पूंछूं ?क्या मुझे प्रार्थना करनी चाहिए ?शायद नहीं …शायद हाँ …ये तो मना है …”नहीं ,बस शुद्ध भाव से प्रार्थना करो ,पर हमेशा उन्हें ही निर्णय लेने दो |
ठीक है ना ,इस तरह आप उनकी तरह ही व्यव्हार करते हो |उन्होंने अर्जुन को भी यही विकल्प दिया था : “मैंने सब कुछ बता दिया है ,अब सब तुम्हें ही करना है |” इसी तरह आप भी सारी कहानी कृष्ण को बता सकते हो ,पर आखिर में जोड़ना मत भूलना :
अब मैंने सब कुछ बता दिया है,अब ये आप पर निर्भर है कि आप ही निर्णय करें कि आप क्या चाहते हैं|”
वस्तुत; हमेशा चयन का अधिकार उनका ही है |अत:शुरू में ही चतुराई से काम लो और जैसा कहते हैं ,”विकल्प उन्हें ही दो” ,पर आप को जो भी मिले ,उससे संतुष्ट रहो |
इस कनिष्ठ स्तर से जब हम सिर्फ अपने लिए प्रार्थना करते हैं ,तब हम जल्दी ही मध्यम स्तर तक पंहुचने के योग्य बनाना चाहते हैं -दूसरों के लिए प्रार्थना करना चाहते हैं | और ठीक भी है क्यूंकि हम कोई नव मत धारण करने वाले नहीं हैं ,हम तो अभ्यासी हैं तो हम दूसरों के लिए प्रार्थना करना चाहते ही हैं : “ ओ मेरे प्रभु !मैं अपने लिए प्रार्थना नहीं कर रहा हूँ ,बल्कि सिर्फ दूसरों के लिए कर रहा हूँ |”लेकिन फिर भी अगर आप अपनी कनिष्ठ मानसिकता बनाए रखते हैं तो आप आध्यात्मिक हिंसा कर डालते हैं |इसका अर्थ क्या है ?उदहारण के लिए यदि आप ईश्वर से प्रार्थना करते है :”ओ मेरे भगवान ,दामोदर को ऐसा बना दें,वैसा बना दें !वह वैसा ही करे ,जैसा कि मैं सोचता हूँ !”क्यूंकि कई बार हमें यह आभास होता है :”अरे !हो सकता है कि यह मित्र, भक्त बन सकता है |इसे भक्त बना देते हैं | यह बात वही है !मैं ईश्वर कि सहायता से अपनी इच्छा उस व्यक्ति पर थोपना चाहता हूँ |ऐसा ही है ना ?ऐसा कई बार होता है | यद्यपि मेरा विचार है :अरे !मैं तो उसके लिए प्रार्थना करता हूँ |”नहीं ! आप अपनी इच्छा को उस पर डालने के लिए प्रार्थना कर रहे होते हैं | आप को अंतर समझ आया ..आया ना ?
तब दूसरों के लिए प्रार्थना कैसे करें ? यदि हम किसी के लिए प्रार्थना करते हैं ,हमें अपनी इच्छा उस व्यक्ति पर नहीं थोपनी चाहिए ,बल्कि ईश्वर की दया को आमंत्रित करना चाहिए या उनका ध्यान उसकी ओर खींचना चाहिए | “ओ प्रभु ,कृपया उस पर दया करें !उसका मार्ग सरल करें |” इस प्रकार आपका ध्यान ,आपकी प्रार्थना की शक्ति उस व्यक्ति कि ओर रहती है ,ईश्वर की ओर रहती हैऔर तब एक सुन्दर सम्प्रेषण होगा I.अत: हमें अपनी प्रार्थनाओं के प्रति अति सावधान रहना चाहिए,क्यूंकि यह अति सशक्त होती हैं | व्यक्ति जितना पवित्र होता है,उसकी प्रार्थना उतनी ही प्रभावशाली होगी
इस प्रकार ,जिस तरह से हमने चर्चा की है ,उस तरह से अपने लिए प्रार्थना करना न भूलें “यह मेरा विचार है,यह मेरी इच्छा है ,लेकिन आप का विचार क्या है ? दूसरा हिस्सा न भूलें | दूसरों के लिए प्रार्थना करना मत भूलो | कृपया उनकी मदद करें ,उनका मार्ग आसान और सरल बनाएं |.” और अंत में एक प्रभावशाली भाव से प्रार्थना करना न भूलें | “इशोपनिषद” में ईश्वर के प्रति एक भाव है:“ ओ मेरे प्रभु ,तुम अग्नि सम महान हो !”एक सामान्य महिमागान : “अरे , आप महान है !आप प्रकाशमान हैं! आप शक्तिशाली हो!” अत: ईश्वर के प्रति यह एक सामान्य समझ है -तुम महान हो | लेकिन हम द्वैतवादी हैं ,इसलिए हम हाथ जोड़ कर प्रार्थना करते हैं |क्योंकि अपने जुड़े हुए हाथों में आप सम्पूर्ण सृष्टि को जोड़ सकते हो ,आप के जोकुछ भी है ,उसे आप समर्पित कर सकते हो |


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