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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से ,२ सितम्बर ,२००६,सोफिया)
. प्रसाद क्या है?उदहारण के लिए,भक्तों की एक रसोई है,जहाँ वे आलू के पापड़ बनाते हैं और जब एक बड़ा ट्रक इन तैयार पापड़ों से पूरा भर जाता है और  वो लड़का बस निकलने ही वाला होता है, तो वह तीन  बार होर्न बजाता है -तब सारे पापड़ महाप्रसादम में बदलने लगते हैं ?”हम भक्त हैं -में भक्त-ड्राईवर  हूँ,वह भक्त -रसोइया (महाराज) है,और ये हैं भक्तिपूर्ण आलू-पापड़ !!!!”नहीं ,कृपा करें ,रूकिए ……
हम गुणवत्ता तलाश कर रहे हैं |अत:घंटी बजाना ही तो हमारी पूजा नहीं है |हमें तो खुद को भी  अर्पित कर देना चाहिए | हमारी भूमिका है – भेंट देना और उसकी भूमिका है ,उसे स्वीकार करने की |क्या वह एक ट्रक के भोपूं  को स्वीकार  करेगा ?मेरा विचार है कि वह कुछ और चाहता है,एक  अलग किस्म का संगीत | उसके कान अत्यंत संवेदनशील हैं |
और निश्चित रूप से  वह  आप के  उन  छोटे छोटे इसमें  और उसमें  रुचि नहीं रखता,जिन्हें आप रसोई में मिलाते रहते हैं |उसके पास तो हर प्रकार के उम्दा व्यंजन वैकुण्ठ में उपलब्ध है |वहां बिग बाज़ार से भी बड़े बड़े स्टोर हैं |पर कृष्ण कहाँ खाते हैं ?वैकुंठ में नहीं ,वरन घर पर अथवा शुद्ध भक्तों के ह्रदय में |वे माता यशोदा की रसोई में खा रहे हैं | माता यशोदा भोजन चखती हैं,” मेरे कृष्ण के लिए यह ठीक है या नहीं ?”एक बार मुझे एसा अनुभव हुआ,कि माता यशोदा को भोजन चखना ही चाहिए ,अन्यथा यह तो असंभव है | उनका प्रेम अपने छोटे से पुत्र के लिए इतना अधिक है कि वे उसे बाहुत गर्म चीज़ नहीं दे सकतीं  या हो सकता है कि उससे होंठ जल जाएँ या कुछ डालना रह गया हो |उन्हें चखना ही चाहिए कि अच्छा बना है या नहीं? और अगर ठीक नहीं है तो वे कुछ और मिला देती हैं और इस प्रकार वे भी खुश हो जातीं हैं और वह भी खुश हो जाता है | एक बार कुछ एसा भाव मेरे मन में आया :शायद ये ठीक नहीं है(ऐसा करना ठीक नहीं है ) ,शायद ये समझ ठीक नहीं है :” पर अगली बार जब मैं एक आचार्य से मिला तो उन्होंने बताया :”माता यशोदा हमेशा ही  कृष्ण के भोजन को चखती हैं |”
तो आपके चढ़ावे की यह विशेषता होनी चाहिए |यह केवल भोजन सामग्री ही तो नहीं है |इसी प्रकार जब आप प्रसाद  लेते हैं ,तो यह वो गुणवत्ता है जो आप को मिल रही है |तभी दैविक शक्ति उस भोजन में होती है — और क्या आप उसे महसूस कर सकते है या आप सिर्फ  पेट भरने के लिए उसे ग्रहण करते हैं ,सिर्फ मज़ा लेने के लिए ग्रहण करते हैं ? खाना खाना भी खास होना चाहिए | हमें निपुण खानेवाला होना चाहिए |
एक बार ,बहुत पहले एक  भक्त था ,उसने अपने गुरु से पूछा ,”गुरूजी ! मुहे एक शंका है | कृष्ण  जन्माष्टमी होती है और  राधाष्टमी भी  होती है  पर  मुझे ये समझ में नहीं आता कि कौन ज्यादा बड़ी है – जन्माष्टमी  या  राधाष्टमी ?” गुरु ने कहा : “ ऐसे कैसे भई,यह तो साफ   है !  वेसे तुम क्या सोचते हो ?” तब लड़के ने कहा : “  जन्माष्टमी पर हम सारा दिन उपवास रखते है और  राधाष्टमी पर केवल आधा दिन तो हो सकता है कि   जन्माष्टमी बड़ी  है क्यूंकि उस दिन  लम्बा उपवास रखा जाता है,हो सकता है कि यह अधिक महत्वपूर्ण है |” पर तब गुरु ने कहा :”तू इतने सतही तौर पर कैसे सोच सकता है मेरे बच्चे ? कृष्ण बहुत उंचाई पर हैं तो आप उन्हें उतना अधिक मान देते हो | पर राधा बहुत ही प्यारी हैं -अत:आप दिन में भी खा सकते हैं | जब कृष्ण हैं तो अधिक आदर है ,राधा में अधिक प्यार (मिठास) |अतेव हमारा जो त्यौहार मानना है वो तो  राधाष्टमी है ,यह बहुत ही प्यारी है और इसमें ज्यादा सुधा मिली हुई है और तुम्हें  भी  राधिका के इस अमृत का स्वाद लेना चाहिए |”,लड़का आँख -कान खोले सुन रहा था | उस दिमाग तेजी से काम कर रहा था | उसने कहा  ,”पर गुरुदेव ,तब हम सारे समय क्यूँ नहीं खाते रहते?” क्या बात है !एकदम  तर्कपूर्ण  निष्कर्ष !! है ना ?
. यदि हम सारे समय अमृत पान कर सकते हों ,यदि आप हर समय प्रसाद  का मान कर सकते हो  तब आप को सारा दिन खाते  रहना चाहिए | हमारा भाव ही ये होना चाहिए कि हमें प्रसाद की सराहना करनी है |अगर आप का भाव ऐसा है तो आप को सारा दिन खाते रहना चाहिए |अगर आप ऐसे भाव से सो सकते हैं तो आप को  दिन में  २४ घंटे  सोना चाहिए | तो ब्रहम्चारियों के लिए एक नई सम्भावना !ठीक  ?”मैं अपने ध्यान का  अभ्यास कर रहा हूँ|मुझे परेशान न करें |मैं योग -निद्रा में हूँ |”निसंदेह ,यदि अगर किसी को इस तरह सोने में महारथ हासिल है,तो यह  सेवा-भाव  तो उसका स्वप्न हो सकता है |पर जब तक आप इतने शुद्ध  भाव में ना हों,तब तक अपने खाने पर नियंत्रण रखें,अपने सोने पर नियंत्रण रखें |
” लेकिन भक्ति का यह मधुर भाग भूलें नहीं ,एक बार कुछ भक्त चर्चा कर रहे थे और एक ने कहा ,’पता है,में प्रसाद के लिए आता हूँ|” उन्होने अपनी आधी जिन्दगी पूजा में निकाल दी थी | दूसरे ने कहा ,”में भी प्रसाद के लिए आता  हूँ |” और तीसरे ने कहा ,”हम्म ,पता है ,मैं तो प्रसाद के लिए रूका हूँ  |”
तो यह है गुणवत्ता -भेंट देने  कीगुणवत्ता और  भेंट लेने की गुणवत्ता | इसे समझना या देखना थोडा और ज्यादा मुश्किल है  जब हम मानवीय आधार के बारे में बात करते हैं | जब हम बात करते हैं -दैवीए कृपा के अपनी ओर आने की तो चित्र अधिक स्पष्ट होता है |पर एक पवित्र भक्त की शक्ति का किसको पता है?यह आँखों से दिखाई नहीं देता , यह सतही रूप से समझने की बात नहीं है| आशीर्वाद आपके अस्तित्व(जीवन) में गहरे  से प्रवेश कर असर करता है |


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