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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क..तीर्थ   महाराज  के व्याख्यान से , २७  मई ,२००६ , सोफिया )
परम -धर्म सर्वोच्च  कर्त्तव्य है | कर्त्तव्य कई प्रकार के  होते हैं ,लेकिन सर्वोच्च  एक ही  कर्त्तव्य है | बहुत सारे काम/कर्त्तव्य का आपको  पता होता है हैं क्योंकि वे   हर दिन आप के सामने होते हैं | परम -धर्म  ईश्वर की उपासना है | अपनी  पवित्र भावनाओं को उन्हे समर्पित करिए |.यह सब परिस्थितयों  में  पूरा करना  चाहिए | कभी-कभी परिस्थितिवश आप अपने बाह्य शरीर से यह नहीं कर पाते,. पर तब ,आप “मम मन मंदिरे ” इस सुन्दर  गीत को याद कर सकते हैं | ” मैं अपने हृदय मंदिर में आप की आराधना करूंगा | मैं अपने नेत्रों को घी के दिए के समान अर्पित करूंगा  और अपने अश्रुऑ को जल के समान चढाऊंगा I ”  आप इसे किसी भी वक्त कर सकते हो | इस भेंट को चढाने से आप को कोई नहीं रोक सकता है |
लेकिन वस्तुत:,यदि हमें मौका मिलता है ,तो हमें आना चाहिए और इसे व्यावहारिक रूप में करना चाहिए ,केवल आध्यात्मिक रूप में ही नहीं करना चाहिए | . हम कई बार,बहुत बार ,रविवारीय धर्मों के विषय में बात करते हैं | कुछ लोग प्रत्येक   रविवार को गिरिजाघर जाते हैं  और  कई बार हम इसकी आलोचना करते हैं .”बस   रविवार को  !?”  पर कभी -कभी आप देख सकते हो, कि  मंदिर  जाना कितना मुश्किल हो जाता है ,रोज भजन गाना  मुश्किल होता है ,क्यूंकि आप व्यस्त रहते हैं ,इधर  से उधर भाग रहें हैं ,कभी इसमें तो कभी उसमें ,समय बर्बाद कर रहे हैं | t.
अत: इस परम -धर्म को भूलें  नहीं , इस मुख्य -कर्म/कर्तव्य को  |  मुख्य काम  तो है कृष्ण से जुड़ना , और यह केवल तभी संभव है जब जब इस का ध्यान रखा जाए,पालन पोषण किया जाए |कृष्ण की उपस्थिति को हम तभी अनुभव कर सकते है ,जब हम इसको बढाएँगे /विकसित करेंगे |”मम मन मंदिरे …”


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