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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ .क .तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , ३ सितम्बर २००६ सोफिया)
आइए ,अब पद -सेवनम की बात करें !पद-सेवनम क्या है ? अत्यंत साधारण रूप से की गयी सेवा इसमें निहित है |और कुछ दूसरे कार्य भी इसमें जुड़े हैं जैसे धार्मिक स्थलों पर जाना,तीर्थ-यात्राएं| पर यदि हम आश्रम में, मंदिर में कुछ व्यवहारिक कार्य करते हैं ,तो वो भो इसी प्रकार समझा जाता है |उदहारण के लिए,जब आप मंदिर का फर्श साफ करते हैं -जो कि बहुत आसान सेवा है ,बिलकुल भी जटिल नहीं है|इसके लिए आप को दो डिग्रियों की जरूरत नहीं है -पर फिर भी इसे करने का एक तरीका है -इसे अच्छी तरह कैसे किया जाए| प्रभुपाद,स्वयं,अपने शिष्यों को फर्श कैसे साफ़ करें,यह दिखाने को तैयार थे | आप जानते ही हैं कि ये पश्चिम के लोग चीजों को ठीक तरह से करना नहीं जानते हैं | वे दिखा रहे थे कि `यह केवल अनर्थक(बेकार) पोतना नहीं है,वरन पोछना का अर्थ एकत्र करना भी है | तो -फर्श कैसे साफ किया जाए यह शारीरिक know-how है|,लेकिन एक आध्यात्मिक know-how भी है -मंदिर का फर्श कैसे साफ़ करें ! यह एक ध्यान लगाने जैसा भी है |जब मैं मंदिर का फर्श साफ़ करता हूँ तो असल में मैं अपना ह्रदय साफ कर रहा हूँ | कृष्ण-आगमन हेतु और भी अनुकूल परिस्तिथि बनाना |इसीलिए हम अपने मंदिर को साफ करना पसंद करते हैं | इसे साफ रखना हमें पसंद है |जो बाहर है ,वही अंदर है|
अत:आप कह सकते हैं :”अरे ,पोंछां लगाने (फर्श पर पोंछा लगाने ) को लेकर गुरुदेव तो सनक गए हैं|”पर क्या आप को बात समझ में आई?हाँ ,आप को भी सनकी बनना पड़ेगा – जितना हो सके उतना ज्यादा अपने मंदिर को स्वच्छ रखने के लिए | ठीक है ? वैसे तो फर्श साफ करना एक तुच्छ काम समझा जाता है -अधिकतर इसे नौकर साफ करते हैं |पर यदि हम इसे प्रभु की सेवा के रूप करते हैं ,इसे गहन ध्यान रूप में इस प्रकार करते हैं कि फर्श से इस धूल को पोछ कर मैं अपना ह्रदय भी साफ कर रहा हूँ – तो तुरत ही यह महत्वहीन काम एक उत्तम प्रकार के ध्यान में परिवर्तित हो जाता है ,आत्मानुभूति के रूप में |
तो रोजमर्रा के काम करने का आध्यात्मिक तरीका यही है | एक बार फिर से – यही वो गुण है जिसे हमें पाना है | तब आप जो कुछ भी करेंगें ,वह प्रभु के प्रति स्नेहपूर्ण भेंट होगी |
सही है ना ? भक्ति की इस प्रक्रिया के हर छोटे से छोटे तत्व को हम उत्कृष्ट(बेहतर) बना सकते हैं |ऐसा मत सोचो कि इसके आगे कोई अगला चरण नहीं है | “क्या- श्रवणं,कीर्तनं -ये तो मैं असंख्य बार सुन चुका हूँ ,तो मैं तो इसके बारे सब कुछ जानता हूँ | नहीं.हम तो अभी शुरुवात में हैं !हमें अपने अभ्यास को सशक्त करना है |(अभ्यास को बढ़ा देना चाहिए)


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