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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क.तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत ,२५ नवम्बर,२००६,सोफिया)

यदि कृष्ण के प्रति हमें श्रद्धा है,तो दोष/गलतियाँ भी शानदार हो जाती हैं | अत: हम कह सकते हैं कि एक वैष्णव या एक भक्त सदेव अच्छा होता है,भक्त बुरा नहीं होता | भक्त उत्तम है,उत्तमतर है,अति-उत्तम है |यहाँ तक कि एक युवा नौसिखिया भक्त उस हीरे की भांति है,जिसे तराशा नहीं गया है,जो अनगढ़ है |इस अवस्था में भी यह बहुत बहुमूल्य है |पर जब तराशने ,ठीक प्रकार के रखरखाव और पोलिश के बाद यह बहुत बढिया बन जाता है ,तो समस्त प्रकाश सामने आ जाता है |यदि सारे भक्त अनगढ़ हीरे हैं तो हमें एक मास्टर की आवश्यकता होती है ,जो उनमें से तेज को बाहर लाए|

हम कह सकते हैं कि तेज हीरे का सार है | तब हीरा है क्या ? यह ग्राफिट का सार और अंतत: कोएला है | अभी भी कोएले को हीरा बनने के लिए कुछ और मिलाना जरूरी है |वह क्या है?समय और दबाव |गहन दबाव |दोनों आवश्यक हैं|इस का अर्थ पीडाएं नहीं हैं,बल्कि यह तो एक प्रक्रिया है | हमें कीमत चुकानी है |कोएले को आप अंगीठी में प्रयोग करते हैं और उससे केवल गर्मी प्राप्त होती है |आप अपने तेज को नहीं जलाते हैं |क्योंकि हीरा अलग प्रकार की तरंग लाता है |कोई भी महिला स्वयं को कोएले से सजाने की मूर्खता नहीं करेगी | अत: आप जानते ही है कि प्रेम की शुरुआत में भावी पति हीरे की अंगूठी लाता है |वो भी कुछ कैरेट की न किएक ग्राम की | पर यदि आप दस किलो कोएला लेकर उसे जीतना चाहते हो – तो यह काम नहीं करेगा |कोएले और हीरे की तरंगो में अंतर है |हम सभी को तराशा हुआ हीरा बनना है | कोएला मत बने रहो|कोयले को धोना व्यर्थ है – यह काला ही रहेगा |तब भी , उचित दबाव व समय देने से गहरा काला कोयला पारदर्शी हीरे में बदल सकता है |

आध्यात्मिक प्रक्रिया में बुरे पक्ष का किस प्रकार से प्रयोग करें? हमें बुरे पक्ष को पहचानना होगा,हमारे जीवन के बुरे तत्त्व कौन से हैं?वे छ: शत्रु कौन से है?काम , क्रोध , लोभ, मोह , मद ,और मात्सर्य | काम, क्रोध , लोभ थीं मुख्य शत्रु हैं |हम उनका प्रयोग किस प्रकार कर सकते हैं ? आध्यात्मिक प्रक्रिया में हम काम को किस प्रकार प्रयोग कर सकते हैं ?कुब्जा का उदहारण लें | कुब्जा एक कुबड़ी महिला थी |पर कृष्ण के प्रति उसे गहन प्रेम था|और उसका प्रेम इतना गहन था कि वह कृष्ण की बहुत सेवा करना चाहती थी,इतनी कि उसके जीवन में एक बड़ा परिवर्तन घटित हुआ |आप को पता ही है कि कृष्ण की पसंद विशेष है | वे कुबड़ी महिलाऐं पसंद नहीं करते |उन्हें सुंदरियाँ पसंद है| उन्होंने कुब्जा के पैर पर पैर रखा और गर्दन से पकड़ कर उसे ठीक कर दिया |अचानक ही वह कुबड़ी से सीधी होगई |दैविक स्पर्श होने से कुरूप स्त्री से ,वह अति-उत्तम सुंदरी बन गयी| अत: भावुक प्रेम होने पर,काम भाव से भी प्रभु के प्रति भाव रखा जा सकता है ,आप इसे प्रयोग कर सकते हैं |इसमें कोई बुराई नहीं है |

और क्रोध ,गुस्सा? आपको अपनी गलतियों पर गुस्सा होना चाहिए |क्रोध का अति उत्तम प्रयोग! लोभ या लालच ? हमने पहले भी चर्चा की है कि बिना असली लोभ के आप कृष्ण को पकड़ नहीं सकते| आद्ध्यात्मिक लोभ होना आवश्यक है ,आपको लोभ होना चाहिए भक्ति के लिए | मोह,भ्रम |मोह का प्रयोग हम भक्ति में किस प्रकार कर सकते हैं ,जो कि ज्ञानोदय हेतु है|लक्ष्य है -ज्ञानोदय और आप भ्रम का प्रयोग इसके लिए कर रहे हैं — यह असंभव है ! नहीं,हम भरम का प्रयोग भी कर सकते हैं और पूजा भी कर सकते हैं ,क्यूंकि हम यह भूलना चाहते हैं कि ईश्वर महान है | हम एक अंतरंग भगवान चाहते हैं ,एक मित्रवत भगवान,जो सहज प्राप्य हो | यह एक प्रकार का भ्रम है,दैविक भ्रम | फिर मद – पागलपन | हमें कृष्ण के लिए पागल होना चाहिए | संतुलित हर्षोन्माद की आवश्यकता नहीं है | यह नियंत्रित आग के समान है| प्रचंड अग्नि को प्रचंड ही होना चाहिए | और अंतत: द्वेष ,मत्सर्य |आप इसका प्रयोग नहीं कर सकते | जलन का प्रयोग आध्यात्मिकता में नहीं हो सकता |यह एक मात्र चीज़ है ,जिसको इस प्रक्रिया से बाहर रखना चाहिए | बाकि सभी दोषों का आप प्रयोग कर सकते हैं |अपनी प्रगति में इन शत्रुओं तक का प्रयोग किया जा सकता है |



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