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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( श्री भ.क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत ,२५ नवंबर ,सोफिया )

हमें अपने विश्वास को बढ़ाना चाहिए,पर सकारात्मक भाव से ,न कि चुनौती के भाव से | ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार देवताओं ने क्षीर सागर मंथन आरंभ किया |यह बहुत भरी काम था,जबकि वे बहुत शक्तिशाली थे ,फिर भी वे इसकी पूर्ण करने में समर्थ नहीं थे | अत: उन्हें सहायता चाहिए थी और उन्होंने अपने शत्रुओं : दानवों ,से बात की:
– हमारी सहायता करो|हम मिलजुल कर काम करते हैं |आओ एक सामूहिक कार्य करें |हम फल बाँट लेंगे |
तो वे तैयार हो गए :-ठीक है? बाजी क्या है? क्या मिलने की सम्भावना है?
– अमृत, अमरत्व का रस |
– ठीक है|बढ़िया है |चलो इसे मिलकर करते हैं |क्या करना है?
– देखो,यह क्षीर सागर है,हमें इसे मथना है |
– इस कैसे करे ?
मथने के लिए एक डंडी की जरूरत होती है, है न? मंदर पर्वत — एक बड़ा पर्वत –उसे वे मथानी की तरह डाल रहे थे |पर अगर आप के पर्वत को सागर में डाल दो तो वह तो गायब हो जाएगा ,तली में डूब जाएगा | उन्हें एक सहारे की जरूरत थी | अत:विष्णु ,कुर्म रूप में -एक दैविक-बड़े कछुए के रूप में इस पूरे कार्य को करने के लिए आये |
हम ऐसा भी सोच सकते हैं कि विष्णु तक देव और दानव के इस संयुक्त उद्यम के लिए सेवाएँ देने को तत्पर थे ,जो कि एक सुन्दर तरीका था — कि ईश्वर इतने विनम्र हैं कि वे अपने अधिनस्तों की भी सहायता करते हैं |पर वास्तव में यह कहानी थोड़ी सी अलग है क्यूंकि कुर्म की पीठ थोड़ी सी खुजा रही थी |आप जानते ही हैं कि कछुए के लिए पीठ खुजाना काफी कठिन है |इस लिए इस मंदर पर्वत को उसकी पीठ पर रखना पड़ा ,ताकि उसकी खुजली ख़त्म हो जाए |यह कारण था कि उसे उसकी पीठ पर रखा गया |
मथने के लिए मथानी को चलाने के लिए आप के पास एक रस्सी होनी चाहिए | आप जानते है कि कैसे मथा जाता है | वे रस्सी को इस तरह से खीचते हैं कि जैसे कि वो चल रही हो |पर सर्वव्यापी सागर को मथने के लिए आप को एक सख्त रस्सी चाहिए |अत: उन्होंने वासुकी,दैविक सर्प को रस्सी की भांति प्रयोग किया | और पता है ,देव-दानव के बीच एक प्रकार की प्रतिस्पर्धा सी थी : रस्सी का कौन सा सिरा लिया जाए?दानवों ने सोचा :”अच्छा,साप की पूछ पकड़ना इतना सम्मानजनक नहीं है |”उन्होंने कुछ ऐसा किया कि जिससे वे वासुकी का सर पकड़ सकें | देवता मन ही मन हसने लगे ,”ठीक है ,हम पूंछ ही पकड़ लेते हैं “और तब उन्होंने मंथन शुरू किया |यह मुश्किल क्षण था,वासुकी थोड़े दबाव में थे —इतने कि उनके मुंह से आग और धुआं निकलने लगा | तो दानव की वह सम्मानजनक स्थिति जो वासुकी के सर पर होने से थी , असफलहो गयी क्यूंकि वे जल गए और धुंआ – धुंआ हो गए |

लेकिन अंतत: संयुक्त उद्यम ने कार्य करना शुरू कर दिया. और तुम्हें पता है, जब आप दूध मथते हैं , यह अलग होना शुरू जाता है है और कुछ चीज़ें करने के लिए सतह पर आनी शुरू हो जाती हैं |तो क्षीर सागर की सतह पर सबसे पहले क्या दिखाई दे रहा था? सबसे पहले विष आया |यह था हलाहल ,विष | वे अमृत की खोज कर रहे थे और उन्हें क्या मिला?विष ! यह एक अत्यंत खतरनाक विष था , जो सारी दुनिया और अस्तित्व को समाप्त करने में सक्षम था | उन्हें सहायता की आवश्यकता थी क्योंकि दोनों पक्ष मृत्यु के सामने थे | तब भगवान शिव आए और पूरा विष पी लिया: “. मैं इसे ले लूँगा , कोई समस्या नहीं है ” वे योगगुरु है, उन्होंने सिर्फ अपनी गर्दन में ,अपने गले में विष , संरक्षित कर लिया | वे मृत्यु को प्राप्त नहीं हुए , लेकिन अभी भी विष का कुछ प्रभाव था – उनका गला नीला हो गया.
.फिर देव और दानव मंथन करना जारी रख सके |. और पहली निधियां प्रकट हुई| तो पहले क्या था ? अश्व .उच्चैःश्रवस् प्रकट हुआ ,एरावत आये- इंद्र का हाथी, लक्ष्मी देवी आई , और कई अन्य कीमती चीजें, लेकिन अभी भी अमृत के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ी | सार्वभौमिक डॉक्टर और आयुर्वेदिक चिकित्सा के अधिकारी – धन्वन्तरी भी प्रकट हुए और अंत में अमृत प्रकट हुआ | तब उन्होंने इसे बाटना और एक दूसरे से छीनना आरंभ किया | लेकिन मैं कथा के इस भाग में नहीं जाऊँगा |तो, सार्वभौमिक क्षीर सागर को मथने पर अंतत: उन्हें अमृत मिल गया |
.हम कह सकते हैं कि क्षीर सागर हमारे जीवन का प्रतिनिधित्व करता है| हमें जीवन-मंथन करना है क्यूंकि हमारा जीवन-सागर बहुमूल्य निधियों से भरा हुआ है |हमें हमारी सभी शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए – वे ,जो अच्छी है या बुरी — आपको अपनी अच्छी व बुरी दोनों शक्तियों,आदतों,बल को एक करना है ,अपने सागर का मंथन करने हेतु : अमृत प्राप्त करने के लिए | कृष्ण,विष्णु को हमें इस प्रक्रिया का आधार बनाना चाहिए |और इस बात से बिलकुल भी आश्चर्यचकित न हों कि जब मंथन आरम्भ हो तो तो सबसे पहला फल विष हो |आप अमृत कि आशा करते हैं ,विष मिलता है | आप ख़ुशी कि कामना करते हैं – कठिनाइयाँ सामने आती हैं | आश्चर्यचकित बिलकुल न हों क्यूंकि कहा गया है कि पहले आप वो पाते हैं जो काम आवश्यक होता है | पहले कडवी दवाई ,फिर अमृत |आप जानते है कि कुछ दवाइयां है जो बहुत कडवी होती हैं और उन्हें निगलना तक मुश्किल होता है |पर दवाई वाले रोगियों को धोखा देते हैं ,वे दवाइयों पर कुछ मीठा लगा देते हैं |यह एक तेल होता है जिसका एक विशेष स्वाद होता है –अरंडी का तेल | कप के नीचे वे अच्छा सा जूस रखते हैं और ऊपर तेल |अगर इसे एक घूँट में पी जाते हो तो आप केवल मीठा स्वाद अनुभव करोगे | दवाई वाले कि यह भ्रम में डालने वाली प्रक्रिया है |
अत:इस से आश्चर्य चकित न हों कि सबसे पहले विष हलाहल प्रकट होता है |उपचार का यह आवश्यक भाग है |पर हमारे पास वे भी हैं जो विष को हजम कर सकते हैं |अत: भगवान शिव का एक कार्य यह भी है कि वे आप से विष समाप्त करें|गुरु शिव कि भांति है ,जो विष ग्रहण करते हैं | ईश्वर मूलाधार हैं |मथानी सन्यासी का दंड है |आपकी जप-माला रस्सी है|मुझे लगता है कि विष को आप पहचान सकते हैं | आप इसे पहचान लोगे ,जब यह आएगा: अच्छा ,तो यह है !” पर जब बहुमूल्य चीजें आने लगती है



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