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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ.क.तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , ३ सितम्बर ,२००६ .सोफिया )
/“ सर्दी में ,गर्मी में ,मैं कष्ट भोग रहा था,मेरा जीवन व्यर्थ जा रहा था/”
व्यर्थ में जीना – यह बुधिमत्ता की कमी है या यूँ भी कह सकते हैं कि व्यर्थ में जीना दुर्भाग्यपूर्ण है |इस बार आपको मौका नहीं मिला |पर व्यर्थ में मत जिओ ! किसी उद्देश्य हेतु जिओ ,किसी अच्छे उद्देश्य हेतु |और यदि हम अक्लमंद हैं तो हमें सबसे अच्छे उद्देश्य हेतु जीना चाहिए | वह सर्वोत्तम उद्देश्य क्या हो सकता है ?भौतिकता को प्राप्त करना ?नहीं.यह आपके पास ठहरने वाला नहीं |एक एतिहासिक पात्र हुए हैं – सिकंदर महान| संभवतः अपने समय में उसने समस्त सभ्य राष्ट्रों को विजित कर लिया था – यहाँ से भारत पहुँचने के लिए | पर उसने अपने सलाहकारों को आदेश दिया था :” मेरे मरने के बाद मेरे शरीर को ऐसे रखना कि मेरे हाथ बाहर (खुले )हुए रहें |”क्यों ? क्यूंकि “यद्यपि मैं समस्त विश्व का सम्राट हूँ ,फिर भी मैं खाली हाथ ही जा रहा हूँ |”
आप यहाँ जिस प्रकार की भी भौतिक संपत्ति बनाते हैं -उसे आप यूँ ही गवां देगें!तब आलसी मनुष्य कहेगा “मैं किस लिए काम करूं? सब कुछ तो ख़त्म होना ही है तो किस लिए कष्ट उठों ?”! पर जब तक आप कुछ प्राप्त नहीं करेंगे ,तब तक केसे उसका त्याग करेंगे ? ठीक है ना ?तो पहले कमाओ तो सही ,फिर उसे गवाओं | हमें यह तरीका सीख लेना चाहिए – पहले खूब काम करो,खूब कमाओ,खूब फल प्राप्त हों और फिर उन्हें ईश्वर को वापिस समर्पित कर दो |जीवन व्यर्थ नहीं जाए ,इसका यही तरीका है |
// व्यर्थ में नहीं
जिओ ,किसी उद्देश्य हेतु जिओ//
/“.थोड़े से सुख के किए ,मैं गुलाम बन गया और बुरे लोगों कि संगत में पड़ गया ”/
सांसारिक/भौतिक जगत की यह दुःख भरी कहानी है – थोड़े से लाभ के लिए हम यथा संभव मूर्खताएं करने को तैयार हैं |थोड़े से लाभ की आशा में हम अकुशल लोगों के लिए काम करने को तैयार हैं |पर उस भगवानकी सेवा के किए हम तैयार नहीं हैं,जो सर्वोत्तम है,हर किसी का शुभचिंतक है. उसकी संतुष्टि के लिए नहीं | अपने जीवन के बारे में विचार करो|तुमने अपने लिए कितना कुछ किया है ,कितना तुमने व्यर्थ में लुटाया है – दुष्ट लोगों की चाकरी में (लुटाया है ) – और उसके लिए तुमने कितना किया है?
लेकिन इस जीवन में आपने जो कुछ भी प्राप्त किया हो — अकूत संपत्ति ,यौवन,पुत्र ,परिवार – इन सबसे असली सुख नहीं मिलने वाला | ये थोड़ी ख़ुशी दे सकते हैं , पर वह केवल प्रतिच्छाया है |
हम सीखने की प्रक्रिया का एक हिस्सा हैं | खुशी क्या है,इसे हमें सीखना चाहिए |सबसे पहले हमें आरंभिक स्तर पर कोशिश करनी चाहिए | पर इससे जुड़ कर ना रहें ,वहीं रूकें ना रहें|यह बहुत ही स्वाभविक है कि आरम्भ में लोग निम्न रस से जुड़ते हैं ,पर वहां ठहरो नहीं – ज्यदा ऊँचे सत्य .ज्यादा ऊँचे स्वाद को प्राप्त करो | तभी हमारी ये खोज हमें दैवीय मूल तक ले जाएगी |
जीवन छोटा(कम) है | पर जीने के लिए यह बहुत लम्बा समय लेता है | पर यदि इसकी तुलना सनातन से करें तो यह एक झलक मात्र है | पर यह तभी सार्थक है ,जब यह ईश्वर,कृष्ण को समर्पित है| वर्ना तो ये खा जाता है कि जीवन इतना अस्थिर (चलायमान)है ,जैसे की कमल के पत्ते एक बूँद चलती ही चली जाती है | आप कमल के पत्ते पर बूँद को ठहरने को बाध्य नहीं कर सकते |इसी प्रकार आप इस सांसारिक जीवन को लम्बे समय तक संभल नहीं सकते | विचारणीय समय-बस कुछ ही साल का है | तो ये ५०-६०-८० साल किस बात के किए हम काम में लाएँगे? जीवन ,क्या केवल देह है , पदार्थ है ,जीव-विज्ञानं है,सोचने समझने कि प्रवृति है ? या आपने कोई ज्यादा ऊँचा लक्ष्य ढूँढ लिया है |आप अपनी आत्मा का पोषण करने लगते हैं | ठोस दैहिक चेतना से आप सूक्ष्म शरीर में आ सकते हैं, अपनी उत्कृष्ट बनावट में आ सकते हैं |और तब आता है अगला चरण – आत्म तत्व ,यदि आप समझें तो यही है वास्तविक लक्ष्य | इस तरह आपके दोनों हाथ (में लड्डू होंगे ) भरे होंगे ..अनमोल चीजों से | तब आप कुछ भी नहीं खोएंगे |


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