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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( श्री भ.क. तीर्थ महाराज के “चैतन्य चरित्रामृतम”, अन्त्य -लीला ,चतुर्थ अध्याय पर आधारित व्याख्यान से ,
२८ मई २००६ , सोफिया )
“यद्यपि सनातन गोस्वामी ने चैतन्य महाप्रभु को गले लगाने से मना किया था ,फिर भी प्रभु ने उन्हें गले लगा लिया | उनका शरीर सनातन की देह की नमी से लस गया और सनातन इससे बहुत व्यथित हो गए |” तो कभी -कभी ,जैसा कि हम लोग विचार कर रहे हैं ..अनुग्रह बलपूर्वक भी होता है |सनातन ने इसे टालने का प्रयास किया ,पर वे टाल न सके | महाप्रभु ने उन्हें बलपूर्वक गले लगाया |
“ और स्वामी और सेवक दोनों ही अपने अपने घरों से चल दिए |अगले दिन जगदानंद पंडित सनातन गोस्वामी से मिलने गए |. जब जगदानंद पंडित और सनातन गोस्वामी साथ बैठे और उन्होंने कृष्ण संबधी विषयों पर चर्चा आरम्भ कर दी .तब सनातन ने अपनी व्यथा को सामने रखा ,“श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन कर के मैं अपने दुखों को कम करने यहाँ आया था , पर प्रभु ने मुझे आज्ञा ही नहीं दी ,वो करने की ,जो मेरे मन में था | जबकि मैंने उन्हें मना किया था ,तब भी उन्होंने मुझे गले लगा ही लिया | और मेरे घावों से निकलने वाले स्राव से उनका शरीर लथपथ हो गया | यह मेरी और से उनके चरण -कमलों के प्रति किया जाने वाला अपराध है,जिससे में कभी मुक्त नहीं हो पाउँगा | और साथ ही साथ में जगन्नाथ प्रभु के दर्शन भी नहीं कर सकता . इसका मुझे बहुत दुःख है !में अपने फायदे लिए यंहा आया था ,पर अब पता चला कि जो मुझे मिल रहा है , वो सब उल्टा है | मुझे नहीं पता और मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह मेरे फायदे के लिए कैसे हो सकता है |”
ये दो विचार थे ,प्रथम,प्रभु को मंदिर मैं देखना ,और दूसरा था ,महाप्रभु के प्रति होने वाले किसी भी दोष को टालना | पर यह तो कुछ उल्टा ही हो गया – मंदिर का कोई दर्शन न होना और महाप्रभु के प्रति अपराध | उन्होंने पूरी कोशिश की ,पर उन्हें सफलता नहीं मिली |
“जगदानान्दा बोले “ वृन्दावन तुम्हारे रहने के लिए सर्वोत्तम स्थान है | रथ यात्रा महोत्सव देखने के बाद तुम वंहा लौट सकते हो | भाइयों !प्रभु ने पहले ही आप दोनों को वृन्दावन में रूकने का आदेश दे दिया है | याद है कि रूपा और सनातन दोनों भाई हैं | चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें कुछ खास भक्ति-सेवा करने का आदेश दिया था ,जैसे पुस्तकें लिखना ,प्रवचन देना ,विस्मृत तीर्थ -स्थानों को खोद निकलना …”वहीँ तुम्हें सम्पूर्ण आनंद प्राप्त होगा |यंहा आने का तुम्हारा उद्देश्य पूरा हो चूका है ,क्यूंकि तुमने प्रभु के चरण कमल के दर्शन कर लिए हैं | अत:जगन्नाथ प्रभु की रथ यात्रा के दर्शन के बाद तुम प्रस्थान कर सकते हो |”
सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया ,” आपने मुझे अच्छी सलाह दी है ,मैं वंहा अवश्य जाऊँगा ,क्योंकि यह वही स्थान है जो प्रभु ने मुझे निवास के लिए दिया है |”
अच्छा … सनातन गोस्वामी ने स्वयं ईश्वर के आलिंगन का आनंद लिया | तब भी उन्हें मन की शांति नहीं मिली |क्या आप को अपने मन की शांति मिली ?ज्यादा सम्भावना तो यही है कि नहीं मिली | तो क्या दृश्य हमें देखने को मिलता है .. एक महान भक्त जो ..स्वयं ईश्वर से अंगीकार होकर भी असंतुष्ट रहता है ?!क्या आप इस व्यव्हार को मानने को तैयार हैं ? इसका क्या अर्थ निकलता है कि आप स्वयं ईश्वर द्वारा गले लगाये जांए और फिर भी संतुष्ट ना हों ??
पर तभी कोई मित्र आता है ,जो भक्त है | और आप उससे अपने ह्रदय की परेशानी को बताते हैं,वह आपको कुछ अच्छे सुझाव देता है और आप शांत हो जाते हैं | तो हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि भक्त स्वयं इश्वर से भी अधिक महत्वपूर्ण है | जो हल ,आप और स्वयं ईश्वर आप दोनों नहीं निकाल सकते ..किसी वैष्णव की सहायता से इसका आसानी से हल निकल सकता है |..यह गुरु -सिद्धांत है ,हैं न ? मैं और ईश्वर – कुछ गड़बड़ तो है ,पर जब एक भक्त सहायता के लिए आता है तो वह आसानी से तनाव कम कर सकता है|.यह बहुत सुन्दर उदहारण है !बहुत साधारण घटनाएँ घट रही हैं -भक्त आ रहे हैं ,जा रहे हैं और कुछ विचार -विमर्श कर रहे हैं ,पर हम इन सबसे कुछ आवश्यक पाठ ग्रहण कर सकते हैं |


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