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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




( भ .क. तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६ .११ .२००६ , सोफिया )

मांग अधिक है| कृष्ण थोड़े से संतुष्ट नहीं है | वह पूरी बात करना चाहते हैं | लेकिन फिर भी वे सहनशील हैं ताकि हम इन बिन्दुओं को समझ सकें | याद रखो , सर्वप्रथम वह आपको ,अपने लिए केवल थोडा जल,पुष्प,फल का चढ़ावाचढाने के लिए आमंत्रित करते हैं ….यह मितव्ययी धर्म है |किफायती|”अरे,में इतना ही कर सकता हूँ |ईश्वर के लिए थोडा जल — बढ़िया! यह कोई बड़ा काम नहीं है |यह तो मेरे लिए है , बहुत खर्चीला धर्म नहीं है |”पर अगले ही छंद मैं वे कहते हैं ,”और बाकि सब कुछ …” मैंने सुना है कि यहाँ आपके बॉस तोदोर झिव्कोव हाथ से एक खास इशारा करते थे , है ना ?उसने इसे कृष्ण से सीखा था |
पहले वह कहता है: “थोडा सा पानी”, उसके बाद “और बाकी सब कुछ – जो कुछ भी आप करते हैं ,जो कुछ भी त्याग करते हैं , जो कुछ भी आप देते हैं, आपके पास जो कुछ भी है – बस इसे मुझे दे दो!” वह इसी प्रकार का है, वह आपकी मदद करता है देने के लिए | उसे हरी बुलाते हैं – जो सब ले हटा है |वह सब कुछ दूर ले जायगा- सही में हमारी संपत्ति नहीं,बल्कि मोह को दूर ले जाएगा |
और इस संबंध में कृष्ण एक अच्छी मदद हैं,वह गुरु कहे जाते हैं | एक बार भक्ति सम्बद्ध एक कंपनी थी – वास्तव में मेरे भाईयों की | वे एक फार्म में रह रहे थे, और तुम्हें पता है कि नवयुवकों की तरह , उन्हें कारों से लगाव था | आखिर में उन्होंने एक पुरानी “वोल्गा ” खरीदी – जो सही में एक कचरे का डब्बा थी, इसे चलाना असंभव था | तो, ज्यादातर समय, कार के आसपास पूजा होती थी, सब लोग पूजा करते थे – हो सकता है कि यह कुछ समय बाद चलने लग जाए | अगले हफ्ते गुरुदेव आये और वह समझ गये कि उन्होंने एक कार खरीदी थी| उन्होंने तुरंत कहा: “क्या? एक खेत में कार? ! इसे तुरंत बेच दो ! “कुछ समय बाद वे फिर आये और फिर तुम्हें पता है, कुछ समय गुजरने के बाद ,उन्हें फिर काम करना है तो वे फिर से एक कार लेते हैं – एक और” “वोल्गा, लेकिन वह पहले से ही चल रही थी | तो फिर गुरुदेव [*] आये और कहा: “क्या? एक “वोल्गा “? आप एक बेहतर क्यों नहीं खरीदते हैं? “क्यों? क्योंकि वहाँ पहले लगाव था: “हे, हमें एक कार की जरूरत है?” दूसरी बार ,वहाँ एक नकली विनम्रता था:. “वोल्गा ” काफी होगी “गुरु” आते हैं है और सारे गलत विचारों में कटौती कर देते हैं – या तो आपके लगाव को , या आपकी झूठी विनम्रता को काट देते हैं | . कृष्ण की तरह: पहले वह आपसे अच्छा व्यवहार करते है और फिर वे आपको योग्य ठहराते हैं |

यह आसान है अगर दान का यह भाव , बाँटने का भाव , एक भक्त में शुरू से ही प्रकट होता हो तो | और शारीरिक रूप से इसे देना आवश्यक नहीं है| यदि आप करने के लिए तैयार हैं – तो खेल खत्म , तो आपने सबक सीख लिया है| वासुदेव की तरह – जब कृष्ण का जन्म हुआ उन्होंने क्या किया? उन्होंने मन ही मन में – लाखों गायों का दान दिया | क्यूंकि जब एक लड़का पैदा होता है तो आमतौर पर माता पिता धन वितरित करते हैं | . वे ब्राह्मणों को दान देते हैं , जरूरतमंदों को देते हैं, क्योंकि यह एक शुभ क्षण है | लेकिन वे एक जेल में रह रहे थे, तो वास्तव में उनकी पहुँच अपनी गायों तक नहीं थी , तो उन्होंने क्या किया? उन्होंने मन में दान किया |
हम कह सकते हैं: “वाह, यह बहुत ही किफायती है! यह बात है! मन ही मन में दान करना काफी है| इसका तो समान मूल्य है ,तोमैं अपनी गायों को रख सकता हूँ ,संभाल सकता हूँ | लेकिन मैं मन से बहुत उदार हूँ |”अपमानित कैसे और अभी कितनी गिरी हुई स्थिति है, मैं समझ गया! दान करना , जानते हैं – भारतीय लोगों को यह बहुत अच्छी तरह से पता है: “यह मेरा कर्तव्य है |यह उसके लाभ के लिए नहीं है, यह अपने लाभ के लिए है| एक बार मैं एक पति और पत्नी से मिला – पति भारतीय था और पत्नी हंगरी से थी | वे मंदिर आये थे और जाने से पहले उन्होंने थोड़ा चावल एकत्र किया और कुछ और भी भेंट हेतु,दान हेतु एकत्र किया –यह बाद में महिला ने मुझे बताया | मैं पति के साथ बात कर रहा था – हम एक बहुत अच्छी चर्चा कर रहे थे – और अंत में उन्हें जाना था| और आप जानते हैं, जब पति कमरे से बाहर आया , पत्नी ने उसे बताया, “यह वो उपहार है जो आप देना चाहते हैं |” आदमी ने कहा: “ठीक है, पर बेहतर है कि हम इसे न दें | इस व्यक्ति को कुछ भी जरूरत नहीं है !”मैं हैरान था! कैसा छलिया मन ! मैं हैरान था! शब्दहीन !
ऐसे छलिया मन वाले मत बनो! अगर आप ने कुछ कहा था – कि यह तुम्हारे लिए है – तो इसे करो ! अपने वचन पर रहो |अगर आप ने कहा था: “मेरा घर, मेरा मकान , मेरा शरीर, मेरा मन आप के लिए है” – तो यह है! धोखा मत करो! पाना अच्छा है, मिलना बहुत प्यारा है |लेकिन देना और भी प्यारा है | किसी को खुश करना – यह असली खुशी है | और अगर इस थोड़े से त्याग , थोड़े से समर्पण से हम कृष्ण को खुश कर सकें तो सारा ब्रह्मांड प्रसन्न हो जायगा |

तो एक के बाद एक , पहले हमें देने की स्थिति पर आना है | लेकिन यह सुझाव दिया गया है कि अगर आप इतने “गरीब” हैं, कि आप के पास कुछ भी नहीं हैं , कम से कम आप कुछ राख ही दे दे |राख सब दे सकते हैं| “कुछ” दे दो! अपना समय दीजिए| अपना ध्यान दीजिए| कृष्ण भक्ति ,धन का प्रश्न नहीं है! हमें इसे इस तरह से समझना चाहिए कि मैं इसे खुद के लिए संरक्षित नहीं करना चाहता| यदि अंतत:यह एक अच्छी प्रक्रिया है कि हम सब कुछ दे दें जो कि हमारे पास है | और *वैष्णव *, शास्त्र, *गुरु* हमें यह सीख देते हैं | ज़रा सोचिए कि गुरुदेव आते है और कहते है: “अब तुम *सब कुछ* त्याग दो और अपने जीवन को *पूरी तरह* समर्पित कर दो , अपने सभी भौतिक मोह को छोड़ दो ! ” वह आते है और आपको तुरंत बताते है,- क्या आप ऐसा कर सकोगे ? शायद हम ऐसा नहीं कर सकते. खैर, मैं आपके गुण नहीं जानता, लेकिन मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ | इसलिए वे एक क्रमिक प्रक्रिया का अनुसरण करें| *गुरु* आते हैं और आपको बताते हैं : “. इतनी बार जाप करो ” या फिर वे कहते हैं: “पौंछा लगाओ , लकड़ी काटो , पानी ले आओ.”! हम यह कर सकते हैं ! यह प्रशिक्षण की प्रक्रिया है: जब गुरु कुछ कहते हैं, हमें कहना चाहिए: “हाँ ! ” कितना भी मुश्किल हो – हमें कहना चाहिए: “हाँ!” क्योंकि अंततः अगर वे कहेंगे: “और अब तक अपने सभी मोह – माया दे दो “, हम कहें: “हाँ!” ठीक है, क्योंकि हम “हाँ” कहने के लिए और काम करने के लिए तैयार किए गए हैं ! गुरु तो एक अच्छे प्रशिक्षक है, हमेशा आपको बेहतर बनाने के लिए प्रेरित करते हैं | ओलिंपिक खेल आ रहे है, तो आप को अपनी श्रेष्ठतम क्षमता से प्रदर्शन करना है|
देना आनंद है | त्याग आनंद है,श्रीला श्रीधर महाराज कहते हैं | सुंदर वाक्य ! त्याग आनन्द है!

[*] ब .अ . नारायण महाराज



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