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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(भ.क.  तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से, 25 मई 2006 , सोफिया)
हमें  अपनी  बुरी  आदतों   को  अच्छी आदतों  द्वारा  नियंत्रित  करना  चाहिए | यह   एक  सरल  नियंत्रण  है -आप  अपनी  इन्द्रियों  को  किसी  बेहतर  कार्य  में  संलग्न  रखें |
यदि  हम   अपनी   शारीरिक  गतिविधियों  को  नियंत्रित  रखना  चाहते  हैं  , तो  इसका  अर्थ  यह  नहीं  है कि  हम अपने  सारे  शारीरिक  कार्यकलाप  छोड़  दें | सिर्फ  कार्यकलापों  को  रोकने  से  यह  शुद्धि  नहीं  होगी | लेकिन यदि  हम  इन्द्रियों ,शारीरिक  गतिविधियों  और  दिव्यता  के  बीच  एक  संपर्क  स्थापित  करें  तो  यह  शुद्धता अनायास  ही  आ  जाएगी |
उदाहरणत: ,हमारे नेत्र /आंख. आँख  पर  नियंत्रण  रखने  का  अर्थ   यह  नहीं  है कि  हम  उसे  नोंच  डालें ..सिर्फ् इसलिए  कि  वह इधर उधर तांक-झांक करती रहती है और अलग-अलग वस्तुएं देखती रहती है|  नहीं ..हम  आँख  को  नियंत्रित  करते  हैं,कृष्ण ,चैतन्य  महाप्रभु  पर ध्यान  लगाकर,कृष्ण  के  सौंदर्य  को  देख कर ,  आँख  इस प्रकार से सबसे अच्छी तरह से व्यस्त रहेगी |
आपके  कान भी हैं | यह आवश्यक  नहीं  है  कि आप  कान  बंद  कर  लें ,लेकिन  हमें ,इस  साधन  का  सर्वोच्च  उद्देश्य  हेतु  प्रयोग  करना  चाहिए | मेरा  सुझाव  है  कि  रेडियो  पर  समाचार  न  सुनें , क्योंकि  ये  हमारे  कानो  का  सदुपयोग  नहीं  है | वे  हमारे  कानों में   हर  प्रकार  कि  बेवकूफी  और  गंदगी  उड़ेलने  का  प्रयास  करते  हैं ..लेकिन कभी  कभी  मैं भी   समाचार  सुन  लेता  हूँ . . हर  दूसरे साल  मैं  रेडियो  चला लेता हूँ   और  तब  मुझे  पता  लगता  है  कि  अभी  भी वही पुरानी ख़बरें हैं ..धमाके   ,चोरियां ,लूटपाट, मौतें ,और भी  बहुत  कुछ ,साथ ही   ये  भी  कि  मौसम  भी  ख़राब  है..हम  अपने  कानों  का   इस   बकवास   के  लिए  क्योँ  प्रयोग  करें ?  अधिक  अच्छा  है  कि  हम  अपने  सुनने  की क्षमता  का  प्रयोग  विद- गुरुजनों  की   सलाह   या  ईश्वर  के  सन्देश  को  सुनने  के लिए  करें | यही  आपके   कानों  का  सबसे  सर्वोत्तम  उपयोग   है|
हमारे सर में कुछ और भी छेद हैं | उदहारण के लिए,नासिका/नाक  |अ धिकतर हम विभिन्न  वस्तुओं में अपनी नाक घुसेड़ते रहते हैं.. ज्यादा अच्छा है कि हम अपनी नाक  का प्रयोग  विभिन्न विषयों में हस्तक्षेप करने के लिए  न करें ,  वरन  कृष्ण को समर्पित  धूप या फूलों की सुगंध को सूंघ कर,  हम उसका प्रयोग  अपनी घ्राण- क्षमता  को शुद्ध करने हेतु करें |यह मत भूलो कि कुमार -चार महान  बाल संत –  विष्णु,कृष्ण की आराधना के लिए प्रेरित हुए,क्यूंकि वे विष्णु के चरण- कमलों  पर अर्पित तुलसी के पुष्पों की सुगंध को ग्रहण कर सकते थे |घ्राण  – क्षमता (सूंघने की क्षमता)बहुत प्रबल होती है. गंध और घ्राण प्रणाली मस्तिष्क से लगभग सीधे जुडी  हैं.
अतएव यह भक्ति प्रक्रिया इन्द्रियों को व्यस्त रखने के लिए बहुत अच्छी है |जब आप मंदिर में प्रवेश करते हैं,आप तुरंत  ही धूप की दिव्य सुगंध को  अनुभव करते हैं | यह सुगंध  हमारी  चेतना में एक  अति शुद्ध वातावरण  रच देती है |
हमारे सर का अंतिम छिद्र  मुख /मुंह है और मुंह से आप दो चीजें कर सकते हैं – बोलना और खाना |अधिकांश लोग बेकार का  खाते हैं और अनर्गल  बोलते हैं,लेकिन हमें अच्छे खाने और अच्छे   बोलने द्वारा अपनी जिव्हा पर नियंत्रण रखना चाहिए | अगर आप के पास गाड़ी है जो पेट्रोल से चलती है तो पेट्रोल पम्प पर आप उसमें पेट्रोल ही भरवाओगे, डीज़ल या गैस नहीं- पेट्रोल ही इंजन के लिए ठीक है|  जटिल कौन ज्यादा  है- गाड़ी या मानव शरीर? मानव शरीर ,गाड़ी से थोडा सा ज्यादा जटिल है | फिर भी हमारे  शरीर के लिए सर्वोत्तम ईंधन क्या है,यह हम नहीं जानते हैं | कभी कभी हम बहुत गन्दा ईंधन डाल लेते हैं और तब इसके सही तरह से काम न करने पर आश्चर्य करते हैं | अच्छा होगा कि हम अपने शरीर के लिए ऐसा उचित उर्जा निवेश  ढूँढ लें ,जो शरीर को  सही दिशा की ओर आराम से आगे की ओर  बढ़ाये | अतः  योगिओं के लिए शाकाहारी भोजन की   संस्तुति  की जाती है,क्यूंकि यही शरीर के लिए उचित ईंधन है|
अत:  शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रण में रखने के लिए हम अपना दृष्टिकोण  त्याग नहीं  देते हैं|हम सुनना बंद नहीं कर देते हैं,हम अपने बोलने की क्षमता या भोजन की क्षमता नहीं छोड़ देते हैं,बल्कि हम उन्हें पवित्र करने का प्रयास करते हैं | कृष्ण  के विषय  में सुनो,कृष्ण को देखो,उसकी स्तुति करो,उसका प्रसाद ग्रहण करो | इस दैवी  प्रक्रिया में इन्द्रियों को लगाकर हम इन्द्रियों को पवित्र कर सकते है|


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