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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




श्री भ.क. तीर्थ  महाराज  के व्याख्यान से उद्धृत , ३ सितम्बर.२००६,सोफिया )
अधिकांश मनुष्य सोचते हैं की जप करना या हरे कृष्ण महामंत्र का जप शुद्धिकर्ण औत विधान सम्मत पूजा का अनिवार्य और नियमित शिद्धान्त है |नए लोगोगों के लिए हो सकता है ऐसा ही हो ,पर उनके लिए नहीं जो उपर उठ चुके हैं |यह ,अत्र राधा और कृष्ण के मिलन  की दैविक स्तुति है|और यह कहा जा सकता है की भक्ति का सर्वोच्च  विचार इसमें निहित है क्यूंकि जब मिलन होना ही है तो यह इतना रोचक नहीं है ,पर जब   यह अप्रकट है ,तब यह रोचक है |. जब आप एक व्याख्यान करवाते हैं कहते हैं,’हम दर्शन का मूल  पाठ पढ़ाते है”बहुत कम लोग आंयेंगे| पर आप घोषणा कर दें .”..गुप्त पाठ …कई सौ आ जाएँगे |हर कोई कुछ रहस्य जानना चाहता है
|थी हा!हमारी यही प्रकृति है–जो उपलब्ध है ,उसकी प्रशंसा नहीं होती .पर जब कुछ छुपा हुआ है–“ओह ,यही मेरे लिए है|”
एक बार गुरुदेव ने कुछ मित्रों से कहा,”देखो .यहाँ एक तो पत्रिका है और एक साधारण पुस्तक है और वह पुस्तक ज्यादा गंभीर है|”तो सब बोल उठे,”मुझे तो उसमें से ही चाहिए|”तो लोग ज्यादा शिक्षित होना चाहिए,वे रहस्यों को जानना चाहते हैं और पाता नहीं क्यूँ रहस्यों की अधिक प्रशंसा होती है |
.अत:जब मिलना इतना   स्पष्ट नहीं है ,अप्रकट है ,प्रत्यक्ष नहीं है ,किसी मध्यम द्वारा है और बस छुपा हुआ है –तो इसमें ज्यादा स्वाद है |इसलिए जब आप कहते हैं “राधे श्याम”तो यह प्रत्यक्ष मिलन  है | एक तरफ राधारानी हैं,दूसरी ओर श्यामसुन्दर ,वे मिलते हैं और यही है कथा |यह स्पष्ट है |पर जब आप कहते हैं ,”हरे कृष्ण”..तो हर कोई इस मिलन को समझ नहीं पाता है,यह अधिक अप्रकट है |ऐसा कहा जा सकता है कि महामंत्र में सम्भोग निहित है या मिलन,एक साथ होना ,महामंत्र मैं निहित है |  वस्तुत: हम कह सकते हैं कि महामंत्र  बिलकुल रस की भांति  है|वे एक दूसरे के पीछे भाग रहे हैं,है ना ?एक कृष्ण,एक गोपी ., एक कृष्ण,एक गोपी — कोंन पहले है? तो अगर आप स्वयं को इस मन्त्र हेतु समर्पित कर देते हो  /हरे  कृष्ण  हरे  कृष्ण  कृष्ण  कृष्ण  हरे  हरे  हरे   राम  हरे  राम  राम   राम  हरे  हरे  /– राधा और कृष्ण ,ये शब्द एक वृत्त में नृत्य कर रहें हैं और उनका अर्थ प्रच्छन्न  है |
श्रीमती  राधारानी  इस दैविक नृत्य की मुख्या हैं|वे जब तक वहां होती हैं,कृष्ण संतुष्ट रहते हैं|  पर इस नृत्य में कुछ ऐसे क्षण हैं जब वे अच्छा अनुभव नहीं करती हैं |जैसा कि मैंने आपको बताया वे अति संवेदनशील हैं और वे समझ गयीं कि “कृष्ण नाच रहे हैं”पर उस वृत्त में और भी महिलाऐं है ,उन पर भी वे ध्यान दे रहे हैं ,सिर्फ मुझ पर क्यूँ नहीं?मैं इसे सहन नहीं कर सकती!  मैं तो अपनी ऑंखें भी नहीं खोल रही थी,मैंने अपनी आँख केवल उनके लिए खोलीं और अब वे दूसरों के साथ नृत्य कर रहे हैं ? नहीं,मुझसे ये सहन नहीं होता ” तो वे निश्चय करती हैं,”मैं नृत्य छोड़ रही हूँ |”और ये कहा जाता है कि यद्यपि लाखों गोपियाँ ,महिलाऐं उस रात नृत्य कर रही थी,जैसे ही वे (राधा)चली गयीं,कृष्ण ने समझ लिया,’यह पहले जैसा नहीं है’तो कृष्ण भी अति संवेदनशील थे|वे तुरंत समझ गए,”मेरी प्रिया यहाँ नहीं है “और तब वे उन्हें ढूँढने लगते हैं |
अत: सौन्दर्य और प्रेम,एक दूसरे को ढूँढ रहे हैं |वे एक दूसरे के लिए जी रहे हैं और हमें उनके लिए जीना चाहिए — यह भक्ति सेवा है और इससे चमत्कार होने  शुरू हो जाते हैं,जब हमारे हृदयों मैं दैविक सौंदर्य  और  दैविक प्रेम का उद्भव ,होने लगता है |




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