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Sharanagati

Collected words from talks of Swami Tirtha




(श्री भ .क.तीर्थ महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , ७ सितम्बर of २००६ , सोफिया )

…आज शाम हमारी एक भेंट थी -पूर्ण चन्द्र से मिलने की |पूर्ण चन्द्र सदेव यह याद दिलाने में सहायक रहा है -हमेशा प्रकाश में रहो -असतो मा सद गमय , तमसो मा ज्योतिरगमय , मृत्योर मा अमृतं गमय [*] अवास्तविक से वास्तविक की ओर ,अंधकार से प्रकाश की ओर मुझे ले चलो और मृत्यु से अमरत्व की ओर मुझे ले चलो | यह वेदों की सुदर , सरल प्रार्थना है ,जिसे हर व्यक्ति समझ सकता है , चाहे वह किसी भी परंपरा,धर्म,जाती यहाँ तक कि किसी भी भाषा का क्यूँ ना हो —

पर ,वस्तुत:सामान्य अर्थ हमेशा एक गुप्त अर्थ भी रखता है |” यथार्थ से ..” “यथार्थ क्या है? “उदहारण के लिए ,सभी कष्ट,सभी खुशियाँ,जिन्हें हम बहुत ही असली समझते हों,वे बुद्धि के सागर कि सतह का एक वेग हो |वास्तविक को सनाझने से पहले हमें अवास्तविक को समझना पड़ेगा |इसको मानना अति कठिन है को जो हमें इतना सच्चा लगता है,वह ऐसा नहीं है | संस्कृत शब्द “माया”का अर्थ है “यह नहीं है” |

अवास्तविक से हमें वास्तविक की ओर आना है|इसका अर्थ है,एक पथ ,प्रगति|हम अपनी यात्रा कहीं से आरम्भ करते हैं और हमार कोई गंतव्य होना चाहिए |अत:यह कहा गया है कि जीवन एक ऐसा रहस्य है कि हमें इस विषय पर नहीं सोचना चाहिए,बल्कि हमें इसे समझ लेना चाहिए| यदि हम यथार्थ का अनुभव लेते हैं तो हमें प्रत्यक्ष पता चलेगा कि वास्तविक-अवास्तविक क्या है |परमप्रभु सर्वत्र निहित है |यंहा तक कि हर जीव-आत्मा में|हमें इन निष्कर्षों को समझना चाहिए ,हमें समझना चाहिए कि असल में,सही में इसका अर्थ है क्या | यदि ईश्वर है तो में स्वतंत्र नहीं हूँ,में उसकी दैविक संरक्षा में ,छत्रछाया में हूँ| जितना में उसे स्वयम को समर्पित करूंगा ,उतना अधिक उसके द्वारा आत्मिक बनूँगा |
कहा जाता है कि यथार्थ इस भ्रम से कहीं अधिक सुन्दर है | व्यक्ति के रूप में आपको सौंदर्य के विषय में कुछ समझ है ऐसा मुझे लगता है ,जैसे कि भाव-सौंदर्य अथवा नैसर्गिक -सौंदर्य | कभी कभी मैं आपके देश मैं भ्रमण करता हूँ,और मैं विस्मित हो जाता हूँ – यह प्राकृतिक सौंदर्य का अनंत भंडार है सौंदर्य की खान की भांति है |प्रकृति किसी की तो है |और जिसकी है,वह और भी सुन्दर होगा |हमें पता है कि कृष्ण का रंग सांवला है |उनकी त्वचा सांवली है |मेरे एक मित्र हैं ,वे जब भी बदल देखते हैं ,तो पूछते हैं ,”क्या यही कृष्ण रंग है जब वे सुन्दर-घने बादलों की ओर इशारा करते हैं ,वे कृष्ण नहीं हैं |पर जब वे गहरे सलेटी ,वर्षा जल से भरे होते है ,तब वह कृष्ण -वर्ण है | इस रूप में उस सुन्दर प्रभु को स्मरण करना कितना सरल है |आप जब भी गहरा नीला(सांवला) रंग देखोगे,वह आपको उसकी याद दिलाएगा |
इस प्रार्थना की अगली पंक्ति है, “असतो मा ज्योतिर्गमय”-अंधकार से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो”अधिकतर प्रत्येक आध्यात्मिक व्यक्ति को दैविक प्रकाश अथवा आत्मप्रकाश–जैसी चीजों की चाह है|मुझे यह नहीं पता कि यहाँ कैसा है,पर हंगरी में कब्रगाह के प्रवेशद्वार पर लिखा है–“उनके लिए अनत ज्योति बनी रहे”–यह मृतको के लिए है |सभी को इसकी समझ है कि प्रकाश अच्छा है |”प्रकाश हो–और प्रकाश वंहा था ‘ अंधकार से मुझे प्रकाश की ओर ले चलो”: प्रथम पाठन बहुत साधारण है – हाँ,अँधेरा बुरा है ,समझदारी की कमी,प्रकाश की ओर ले चलो ,…..सरल! में इस सन्देश को ग्रहण कर लेता हूँ |पर अभी हाल में ही हमें पता चलता है की कृष्ण ही वे काले भगवान हैं |तब इस सन्देश को में कैसे समझ सकता हूँ–अंधकार से प्रकाश कि ओर ले चलो ? यह है क्या ?

कृष्ण का श्याम रंग आम रंग नहीं है| उनका श्याम चमकीला प्रकाश है|जरा सोचें,एक कृष्ण वर्ण व्यक्ति,जो चमक रहा हो|यह अति रोचक विरोधाभास है |पर फिर भी ,इस वाक्य को देखें — अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो,मुझे प्रकाश की ओर ले चलो? अंधकार कौन है –यह कृष्ण है -कृष्ण वर्ण, नील वर्ण |तो यह आभायुक्त व्यक्ति कौन हो सकता है ?

यह राधा -दास्यं है,श्रीमती राधरानी की सेवा | वह प्रभु की प्रिया है |वही हैं ,जिन्हें प्रभु सबसे अधिक प्रेम करते हैं | तो,सरल रूप में यह समझना चाहिए कि परम प्रभु हैं |यह भी समझना चाहीए कि परम देवी भी हैं |वैष्णव परंपरा का,हमारे पथ का यह वास्तविक आनंद है |

और अंतत:,”मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो”यह सन्देश पूरी तरह से स्पष्ट है|अधिकांश मामलों में लोगों को मृत्यु का भय होता है|ज्यादातर आप उस से डरे होते हैं ,जिसे आप जानते नहीं हैं ,जो हम से छुपा हुआ रहता है,रहस्यमय,गुप्त ,यह एक विच्छेद उत्पन्न करता है|..जैसे कि लोग मृत्यु के बारे अधिक नहीं जानते हैं ,तो उन्हें मृत्यु का भय रहता है |अधिकाश मनुष्यों पर यह भरी मानसिक दबाव रहता है| फिर भी यह सरल है क्यूंकि मृत्यु एक क्षण है ,आपके जीवन का यह एक ही अवसर है | ,

जैसे जैसे कलियुग – काला,लोह युग –बढ़ रहा है ,अब लोगों में जीवन के प्रति भय महसूस होने लगा है ,न केवल मृत्यु का डर बल्कि जीवन का भी भय !यह अति बुरा है ,क्यूंकि यह इस जीवन भर तुम्हारे साथ रहेगा |यह केवल एक अवसर नहीं है –यह स्थाई है |अत:हम इस जीवन की सुन्दरता,महिमा और दैविक अवसर को न देख लें ,हमें जीवन का यह भय बना रह सकता है ,मृत्यु का भय बना रह सकता है |
वस्तुत:,सर्वप्रथम हमें अमरत्व के झूठे विचार को त्याग देना चाहिए,दूसरे ,हमें अपनी समझ को शांत करना चाहिए , तीसरे ,हमें ह्रदय की सतुष्टि की खोज करनी चाहिए|इन तीन चरणों का अनुसरण करे:सत – आप अमर हैं ,इसे समझें ,चित- अपनी बुद्धि शांत करें .और आनंद — आत्मा – आनंद की खोज करें | यह मार्ग है नश्वरता से ,मृत्यु से अमरत्व का |

[*] वृहदारण्यक उपनिषद् (1.3.28)



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