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“किसी भी जीवित प्राणी के लिए शोक न करें “[*] क्यूंकि शोक करना काफी नहीं है!यदि मैं आप को लेकर दुखी हूँ,”अरे ,मुझे आप के लिए बहुत खेद है,बहुत ही ज्यादा!मुझे बहुत बुरा लग रहा है!”—यह काफी नहीं है!आप इससे खुश नहीं होंगे!हमें दूसरे लोगों की आध्यात्मिक प्रगति में तत्परता से सहायता करनी चाहिए. इसे ठीक प्रकार से कैसे करें,यह हमें सीखना चाहिए.
हम एक विश्वसनी व्यक्ति से सीखना चाहते हैं.इसलिए लोग अध्यात्मिक सत्ता के पास जाते हैं.”कृपया मेरी सहायता करें.!”-यही मुख्या कारण है.मैं पूर्णता प्राप्त करना चाहता हूँ,कृपया मेरी सहायता करें.!”यह थोडा ज्यादा विनम्रता पूर्ण है.क्यूंकि पहला कहता है,”मैं पीड़ित हूँ,मैं अपना सर्वस्व आप पर अर्पित करना चाहता हूँ.,अपनी सभी पीडाएं आपको देना चाहता हूँ.”दूसरा कहता है,”मेरा एक लक्ष्य है,उसकी प्राप्ति के लिए मेरी सहायता करें.”पर एक सच्चा शिष्य कहता है:मैं पीड़ित हूँ और मेरा एक लक्ष्य है,पर कोई बात नहीं.तुम्हें क्या पसंद है और तुम चाहते क्या हो?यह बहुत दुर्लभ है.है ना ,आप थोड़े से स्वार्थी हैं,काम या ज्यादा.”मुझे ये चाहिए,वो चाहिए.”लेकिन ,”कैसे चाहिए,कृपया मुझे बताओ,क्या किया जाए.”
अपने अध्यात्मिक विशेषज्ञों से हमें बहुत कुछ सीखना है,सबसे पहले तो सीखना है कि कैसे जिया जाए .अधिकतर तो हम जानते ही नहीं हैं कि कैसे जिया जाए. मानवी अस्तित्व के हमारे कोई मापदंड नहीं हैं. इसलिए महान अध्यापकों को बहुत प्रारंभिक नियम बताने चाहिए:हत्या मत करो.झूठ मत बोलो.”जरा सोच सोच कर देखो कि आप को आपने अनुयायियों को इस स्तर पर सिखाना पड़े:”हत्या मत करो…”यह तो कृपा है!आप हत्यारों के बीच जाओ और उन्हें पड़ना शुरू कर दें:”हत्या मत करो.”या आप उन तक जाएँ ,जो झूट बोलते हैं और उन्हें सीखें,:झूठ मत बोलो.” उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी?”गुरूजी,यह असंभव है.यह बहुत उच्च स्तरीय है.यह तो हमारी रोज की प्रक्टिस है.इसे हम कैसे छोड़ सकते हैं?!” सोच कर देखो कि आप इन दस ईश्वरीय आदेशों का पालन करते हो:चोरी मत करो.”आदि आदि.अति प्रारंभिक नियम.अथवा,वैष्णव परंपरा .,”अहिंसा पालन करो.”पुन:हत्या मत करो,दूसरों को दुःख मत पहुँचाओ. बहुत ही साधारण चीज़े हमें सीखनी हैं क्यूंकि यही है जिसकी कमी महसूस हो रही है.हमने ये नहीं सोचा कि स्वार्थी होना हिंसा है.
प्रारंभिक स्तर के बाद भी कुछ और होना चाहिए.हमें अपने गुरु से अभ्यास कैसे करें ,यह भी सीखना है.किससे बचना चाहिए:ये करें ,ये ना करें;और फिर किस का अभ्यास किया किया जाए,मुझे क्या करना है.गुरु यह अभ्यास हमें सीखा सकते हैं:मंदिर आओ,व्याख्यान सुनो,जप करो”यद्यपि हम यह सोच सकते हैं कि :”अरे!मैं जप कर रहा हूँ,,यह सर्वोत्तम है!” नहीं,यह बहुत साधारण है.उसी प्रकार जैसे कि”हत्या मत करो/,जप करो “.अगर मैं स्वयं को ईश्वर के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित नहीं करती हूँ तो मैं एक लुटेरा हूँ.मैं उसकी संम्पत्ति का प्रयोग अपने हित के लिए करने की कोशिश रहा हूँ.जीवन,मेरा नन्हा सा जीवन ,बड़े अक्षरों वाले जीवंन शब्द से आता है.अत:यदि मैं इस जीवन का उपयोग सिर्फ अपने जीवन के लिए करता हूँ तो ,तब मैं इसे उस बड़े जीवन से चुरा रहा हूँ.”अपना समर्पण कर दो”गुरु से सकारात्मक जुडाव भी बहुत प्रारंभिक है.फिर भी टालने से अच्छा है,अभ्यास करना.क्यूंकि अच्छे का अभ्यास करने से स्वाभाविक रूप से आप बुराई से दूर हो जाते हैं.अत;आध्यात्मिक गुरु से ही अभ्यास सीखना चाहिए.
लेकिन सर्वश्रेष्ठ रास गुरु से सीखना चाहिए.भगवान कि पूजा कैसे हो,कैसा अनुभव हो,इस सम्बन्ध को कैसे महसूस करें.यह प्राथमिक स्तर नहीं है.यह उच्चतम है औत उच्च अभ्यासियों हेतु है.पूजा कैसे हो और क्या अनुभव किया जाए.यह सर्वोच्च विषय है जो कि हमें अपने मास्टर से ही सीखना चाहिए.

ये वे विभिन्न चीज़े हैं जिन्हें हमें सीखना है:उचित तरीके से किस प्रकार जिया जाए,तरीका क्या है और लक्ष्य क्या है.उसकी कृपा और आध्यात्मिक गुरु की कृपा से ,हम ठीक प्रकार से विकास कर सकते हैं.किन्तु हमें पठन और प्रदर्शन हेतु गंभीर भाव रखना होगा.और इस प्रकार आप दूसरों के भाग्य से शिकायत भाव नहीं रखेंगे बल्कि आप दूसरों की स्थिति को सुधारने में सहायत करने के एक सक्रिय साधन बन जाते हैं.
[*]”भगवद्गीता”२.३०



इस शाम पर पधारने का आप सब को बहुत बहुत धन्यवाद,क्यूंकि इस तरह आप मुझे सेवा में जोड़ लेते हैं.अन्यथा मैं तो माया में ही डूबा रहूँ.आप मेरे मास्टर हैं,आप मेरी सहायता करते हैं ,जो कुछ भी मैंने सीखा है ,उसे याद रखने में.असल में आप को ऐसा ही करते रहना चाहिए-दूसरों को सेवा के लिए मदद करो,दूसरों की मदद करो कि वे दैविक सन्देश को याद रख सकें-किसी भी प्रकार से-किसीभी उस प्रकार से,जो तुम्हारे पास है.स्तुतिगान द्वारा,सेवा द्वारा,समस्या-समाधान या कूड़ेदान को ठोकर मारना–किसी को भक्ति से जोड़ने के बहुत से रास्ते हैं.पर किसी तरह से यदि हम अपनी और दूसरों की सहायता कर सकें ,यह याद रखने के लिए कि हम यंहा के नहीं हैं,हम एक दैविक संसार के हैं-तो यह एक दैविक सेवा है .
आत्मा एक चमत्कार है.विज्ञान की दृष्टि से,तत्व अचानक ही चेतना पैदा करने लगता है.यह जीवात्मा -विकास है,चेतना का.हम चेतना के विकास में विश्वास रखते हैं.हमें विश्वास है कि आत्मा अधिक शक्तिशाली है,इतनी अधिक कि यह पदार्थ में परिवर्तित हो सकती है.तो तत्व ,चेतना का परिणाम है.भौतिक भाग्य,भौतिक कर्म,भूतात्मा के परिणाम हैं.हरेक को इस रास्ते को पूरी तरह से पार करना है.फिर भी हमें करूनाशील होना है.
एक भक्त की संवेदना क्या है.भक्त? जैसा कि मैंने आपसे आरम्भ में कहा था : कृष्ण को याद करवाने में दूसरों कि सहायता करो.सबसे पहले हमें स्वयं ईश्वर को याद रखने की याद दिलानी चाहिए.
पहले,कुछ अभ्यास द्वारा:ही ,यह अपने आप ही आने लगता है.वास्तविक संवेदना है,दूसरों की आध्यात्मिक उन्नति में सहायता करना.कपडे को बचाना काफी नहीं है ,हमें व्यक्ति को बचाना है.यदि जीव इतना सक्षम है कि वह पदार्थ का निर्माण कर सकता है,तो हमें यह समझ में आ जाना चाहिए कि सब कुछ उसी जगह वापिस आ जाता है ,जहाँ से लिया जाता है.शरीर भौतिक है,यह तत्व से लिया गया है,यह वहीँ लौट जाएगा.आत्मा आध्यात्मिक है,ईश्वर से ली गयी है,यह ईश्वर के पास लौट जाएगी.जीवन,जीवन से आता है.और प्रेम से केवल प्रेम मिलता है!इसके सिवा कुछ नहीं!अति विशिष्ट !यदि परिणाम कुछ और भी हो तो–तो यह पवित्र प्रेम नहीं था.प्रेम, प्रेम से ही मिलता है और प्रेम से प्रेम ही आता है.यह शब्दों का मायाजाल नहीं है.गहराई से मनन करो ! अभी हाल में ही हम चर्चा कर रहे थे कि संतरे से ही संतरे का रस मिलता है.और कुछ नहीं.कैसे भी इसे निचोड़ें,कैसे भी दबाएँ-सिर्फ संतरे का ही रस निकलेगा.संतरे का रस ,संतरे से ही आता है.और संतरे से ही संतरे का रस निकलता है.
यह एक महत्वपूर्ण समीकरण है.परिणाम द्वारा हम स्रोत को समझ सकते हैं.यदि आपके ह्रदय में और अधिक आध्यात्मिक भावनाएं पैदा हो रहीं है,बढ़ रही हैं तो अभी तक आपने जो भी किया है वह अच्छा है.यह आध्यात्मिक है.यदि आप अपने ह्रदय में उलझन .असंतुष्टि ,घृणा अनुभव करते हैं तो आप को अपना अभ्यास बदल देना चाहिए.

सम्पादकीय टिप्पणी : प्रिय भक्तों !
शरणागति का यह १०८वां अंक है और हम इसे आप सब के साथ मानना चाहते हैं, आभासी संतरे के रस के ग्लास से (अदृश्य ,लेकिन न होने वाला नहीं).हम दयावान भक्तों और मित्रों के प्रति अपना आभार और प्रेम पूर्ण सम्मान प्रदर्शित करना चाहते हैं,जिन्होंने हमारे परमप्रिय गुरुदेव श्री भक्ति कमल तीर्थ महाराज के संदेश के लिप्यान्तरण,अनुवाद,संपादन,प्रकाशन,सहभागिता और वितरण में सहायता की (थी ) और कर रहे हैं.

हार्दिक प्रशंसापूर्ण धन्यवाद : : अभय चरण प्रभु ( संपादक-हंगरी -भाषा एवं संस्कृत -सलाहकार), चित्रा देवी (अनुवादक ,संपादक-हंगरी भाषा), माधव संगिनी देवी (अनुवादक -हिंदी ), मंजरी देवी (संपादन-अंग्रेजी एवं बुल्गारियन), हरी लीला देवी ( अनुवादक-रूसी भाषा), वासंती रसा देवी (अनुवादक-जर्मन भाषा) , दामोदर प्रभु (अनुवादक-रूसी भाषा), यशोदा देवी (संपादन-रूसी भाषा), कृष्णप्रिया देवी (लिप्यान्तरण एवं संपादन), डोरा सोलाइटिंग ), यमुना देवी (आशीर्वाद एवं संबल)सुकोवा (अनुवादक-युक्रेन भाषा), स्वेत्लोमिरा सोलाकोवा (अनुवादक-स्पेनिश भाषा), वेसेलिन हजिएव (संपादन-रूसी भाषा), वृन्दावनेश्वरी देवी (अनुवादक-रूसी भाषा), प्रेमा आनंदिनी देवी (अनुवादक-जर्मन भाषा), प्रेमा शक्ति देवी (अनुवादक -रूसी भाषा ), प्रेमानन्द प्रभु(संपादन-अंग्रेजी एवं बुल्गारियन ), परमानंदा प्रभु (पॉडकास्ट एवं तकनीकी सहायता ) तथा सार्वभौम प्रभु (संपादन-अंग्रेजी एवं बुल्गारियन)
सर्वदा आपके आशीर्वाद हेतु कामना करते हैं ,
आपके , सेवा के नाम पर हैं और नाम की सेवा में हैं :
पालना शक्ति दासी (तकनीकी सहायता एवं संपादन-अंग्रेजी एवं बुल्गारियन )
मनोहारी दासी (रूपांतरण एवं बुल्गारियन अनुवाद )

दामोदर :प्रश्न :भावनाएं एवं विश्वास-ये दोनों किस प्रकार एक दूसरे से सम्बंधित हैं?क्या पहले हम विश्वास करें ,तब भावनाएं प्रकट होंगी ;या भावनाएँ विश्वास के परिणाम स्वरुप आ जाएगी ?

तीर्थ महाराज :“आद्य श्रद्धा “[३ ] – प्रथम विश्वास है. लेकिन वह विश्वास, विश्वास का एक प्रारंभिक प्रकार है. विश्वास से पहले क्या है? सुकृति

(आध्यात्मिक गुण) और दयालुता . वो पहले है. ये आस्था के प्रारंभिक चरण के कारण स्वरुप हैं और जब हम विश्वास के प्रारंभिक चरण पर होते हैं , तो हम पवित्र लोगों के साथ संबद्ध होने लगते हैं..फिर रुचि, आध्यात्मिक स्वाद आते हैं, वास्तविक स्वाद . प्रारंभ में, वहाँ भी स्वाद है, अन्यथा हम यहाँ नहीं होते . अगर हमें कृष्ण के बारे में कुछ भी नहीं लग रहा है, तो यहाँ रहने का क्या कारण है? तो अचल विश्वास और वास्तविक भावनाएं साथ साथ चलती हैं. आद्य श्रद्धा, पहले विश्वास है. यह विश्वास हमें जुड़ने करने में मदद करता है. हम कृष्ण के साथ संबद्ध हो सकते हैं, हम वैष्णव के साथ संबद्ध कर सकते हैं, हम गुरु के साथ संबद्ध हो सकते हैं. तो संगत वहाँ है. इस संगत का एक विशेष प्रकार है – गुरु – सेवा.फिर आती है अस्तित्व की शुद्धि .कैसे अनार्थ्थ से मुक्त हों और सेवा में लगें,इत्यादि. फिर है रुचि,रुचि है स्वाद,उच्चतर स्वाद और यह उच्चतर स्वाद हमारे विश्वास को पुष्ट करेगा या उसमें वृद्धि करेगा

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तो क्या पहले है: अंडा या मुर्गी? क्या पहले है: भावना या विश्वास? दरअसल परिष्कृत स्तर पर वे अविभाज्य हैं.

गोपिओं को विश्वास नहीं था. उन्हें प्यार था. आस्था, चलो स्वीकार करते हैं, कई मामलों में सैद्धांतिक है. लेकिन वास्तविक तो है प्यार ! स्नेह का व्यक्तिपरक भाग -जो है विश्वास , और वस्तुनिष्ठ भाग है – सेवा, या बलिदान . गोपिओं को विश्वास नहीं था. वे सैद्धांतिक स्तर पर नहीं थीं . वे कृष्ण को चाहती थीं. चाहे कैसा भी परिणाम हो या प्रतिक्रिया हो. “हम अनन्त नरक में भी चली जाएँ जाना जाएग – कोई समस्या नहीं है” यह विश्वास नहीं है, यह भावना है! भावनाएँ आस्था की तुलना में अधिक हैं. क्योंकि भावनात्मक हिस्सा अधिक सक्रिय है, विश्वास अधिक निष्क्रिय है.कुरुक्षेत्र में जब वे फिर से मिलते हैं- कृष्ण और गोपियाँ- वे कहती हैं :” हम केवल यादों से संतुष्ट नहीं हैं .हम आप को चाहते हैं,यादों को नहीं .” यह विश्वास है?! नहीं! यह भावना है. “मैं आप पर अधिकार चाहते हूँ ” आस्था का अर्थ है “मैं तुम्हारा हूँ.” भक्ति का मतलब है: “लेकिन तुम मेरे हो!” एक विश्वास है, दूसरा है प्रेम . यही अंतर है.

लेकिन क्या पहले आता है, मैं नहीं बता सकता. ये दोनों बहनें सिर्फ एक- दूसरे के पीछे चल रही हैं . एक दूसरे पर कब्जा करने की कोशिश कर रही है, दूसरी , पहली कि सेवा करने की कोशिश कर रही है. वे एक साथ काम करते हैं. आपका विश्वास आपकी भावनाओं कि मदद करता है.आपकी भावनाओं से आपके विश्वास के लिए मदद मिलेगी.

[३] ” भक्ति -रसामृता -सिन्धु ” १.४.१५-१६



हमें प्यार के साथ, स्नेह के साथ नाम का जाप करना चाहिए. यह अल्पज्ञता मंत्र के लिए पर्याप्त नहीं है, यह नियमित रूप से मंत्र जाप करने के लिएभी पर्याप्त नहीं है, यह ख़ुशी के रूदन के समान है : “कृष्ण!” या सहायता कि पुकार के रूप में होनी चाहिए: ” कृष्ण” स्नेह आतंरिक हो सकता है , अन्यथा यह काम नहीं करेगा. यदि स्नेह के बिना किसी भी व्यक्ति का नाम, – आप नाम का जाप करते हो , वह जवाब नहीं देगा .यदि आप के बच्चे को बुलाते हो : बोजिदर ,यहाँ आओ,में तुम्हें मारूंगा!” वह बेवकूफ ही हो सकता है ,जो मार खाने की बात सुनकर वहां आएगा.तो जप की गुणवत्ता बहुत महत्वपूर्ण है. और फिर, इस गुणात्मकता , जप भावनात्मकता ,के परिणाम स्वरुप ,आशीर्वाद आप तक आ जाएगा. यह आनंदित और आध्यात्मिकता मुक्त भव कहाँ है? यह कल है? यह कहीं और है? अगला जीवन? भौतिक क्षेत्र छोड़ने के बाद? नहीं, यह ठीक यहीं है और अभी है . कृष्ण की दया हमेशा रहती है, लेकिन आप को इसे अनुभव करने के लिए अपनी दृष्टि को शुद्ध करना है.

कृष्ण की बांसुरी विभिन्न प्रकार की हैं, विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न बांसुरी वंशी ,वंशुली , वेणु और कई, कई प्रकार की हैं . एक बांस से बनी है , दूसरी संगमरमर से बनी है , तीसरी सोने से बनी है. एक रत्नों से जड़ी है, उनकी एक और बांसुरी अमृत वितरण कर रही है. एक छोटी है, दूसरी लंबी है. और वे विभिन्न प्रयोजनों के लिए अलग-अलग बांसुरी का उपयोग करते हैं, क्योंकि कृष्ण हर रूप में आकर्षक हैं,हम पिछली बार इस बार पर सहमत हुए, तो वे अलग-अलग बांसुरियों का उपयोग करते हैं , हरेक प्रकार के जीव को वापस घर आमंत्रितकरने के लिए.

यहाँ तक कि वैदिक मन्त्रों का जाप करने वाले भी वस्तुत: कृष्ण की वंशी की आवाज़ के पीछे हैं.यहाँ तक कि गायत्री मन्त्र भी कृष्ण की वंशी की धुन है, पर वे ब्रह्मण के लिए नहीं,गायों के लिए बजा रहे हैं और गोपीओं के लिए भी अर्थात सीदे सादे मन वाले लोगों के लिए.और वे तो उसके पीछे चलने के लिए तैयार हैं.तो मेर सुझाव है-मन में जटिलता न रखें,क्यूंकि कृष्ण की बंसी के अनुकरण की क्या बात करें,इसे तो सुनना ही अति कठिन होगा.सादगी है परिभाषा या कृष्ण चेतना केलिए स्पष्टीकरण है. इसलिए हम एक आन्दमय प्रार्थना के रूप में महामंत्र का जाप कर सकते हैं.यह एक बहुत कठिन साधना नहीं है. यह एक तपस्या या आत्म यातना की तरह नहीं है.”मैं इस मंत्र का जाप करके अपने आप को कष्ट दूं . यह महामंत्र दर्दनाक है “नहीं, यह एक आनंदमयी प्रार्थना है:“कृष्ण !”

तुम्हें इसके बारे में काफी कुछ पता है,तो मैं इसे क्यूँ दोहराऊँ

आशीर्वाद की प्रार्थना स्वरुप हमें इस महामंत्र का जाप करना चाहिए,तब ह्रदय का गहरे से गहरा दर्द भी बदल जाएगा. .प्रेम करना अर्थात पीड़ा.पीड़ा के बिना प्रेम नहीं है.पीड़ा/दर्द नहीं है तो प्रेम भी नहीं.यह आप के ह्रदय को चीर दे, ह्रदय को फाड़ दे,आपके प्राण हर ले.आप को कोशिश करनी चाहिए.इन सम्वेंगों से तो आप मर ही जाएँ.विनाशकारी अनुभव.लेकिनअच्छी तरह से अगर आप मंत्र जाप कर रहे हैं ,तो पवित्रा नाम की कृपा से इन दर्दनाक भावनाओं को बदल सकते हैं.आप को खुद के लिए इसे करने की कोशिश करनी चाहिए, मैं इस बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता सकता.आप कर के देखिए.



 दर्द का  स्रोत, विलाप का स्रोत पीड़ा  है. दुख अलगाव  से आता है. प्राथमिक, बुनियादी स्तर पर, और उच्च स्तर  पर भी, अलगाव  विलाप का स्रोत है. एक बार एक  साधु महाराज ने कहा: “जीवन पीड़ा  है. चलो कृष्ण के लिए पीड़ित होएं ! “और मुझे लगता है कि यह एक निराशावादी दृष्टिकोण नहीं है, लेकिन यह  एक अति  यथार्थवादी दृष्टिकोण है. यदि आप अपनी खुशी के पल और अपने मुश्किल क्षणों की एक सूची बनाते हैं, तो आप संतुलन बना रख  सकते हैं. तब आप सहमत होंगे कि जीवन पीड़ा/दुःख  है. पर क्या हम कष्ट सहने  के लिए पैदा हुए हैं? क्या  यह हमारी  दैनिक भोजन  है? हमारे अस्तित्व का क्या यही लक्ष्य  है? मुझे मत बताओ! नहीं! यह कुछ और है. भक्ति योग  कहता है कि ऐसे विचारों को  “नहीं!” कह सकें .  भक्ति योग का अर्थ है कि आप अपने आप को मूर्खता से अलग रखें.लेकिन फिर भी अलगाव तो है ही .
जीवन का  लक्ष्य है, अनुभव लेना . दुख  मोहभंग करने के लिए सहायता  करता है.जब आप अपना  सिर दीवार पर मारते हैं तब  आप समझते हैं कि यह दरवाजा नहीं है. इसभूलभूलैया से  बाहर निकलने का रास्ता नहीं है. और आपके अंदर क्या छिपा है – यह बुद्धि है ,सही ? आपको  अपनी बुद्धि का उपयोग  दरवाजे की पकड़  का पता लगाने के लिए करना  चाहिए.
 विलाप का  स्रोत  पीडा  है, अज्ञान है – इतने सारे अलग अलग तत्व हैं वहाँ. फिर भीआध्यात्मिक अभ्यास से हम चेतना के  एक बेहतरसे  बेहतर और अंततः एक आदर्श अवस्था तक  पहुँच  सकते हैं. तो इस का व्यावहारिक पक्ष यह है: हम सच का अभ्यास करें , हमें आध्यात्मिक साधना का अभ्यास करना  है. और इस से आप अनुग्रह  प्राप्त कर सकते हैं.यह अनुग्रह आरम्भ  में आता  है और अभ्यास के द्वारा आप इसे गहराई से   समझ सकते  हैं, आत्मसात  कर सकते हैं, और फिर आप इसे  प्रतिबिंबित कर सकते हैं. मन की पवित्रता से, आप चेतना की पवित्रता से समझ जाएगें कि  आप पर  कितना  अधिक  अनुग्रह है. आरम्भ  में हमें यह  समझ में नहीं आता. लेकिन बाद में अभ्यास  द्वारा, शुद्धिकरन  द्वारा, हम वास्तव में समझ जाएँगे  कि यह अतुलनीय  है !.
 यमुना : महाराज ,आप भौतिक संसार  दुनिया की  पीड़ा के बारे में बोल रहे थे. क्या आप आध्यात्मिक पीड़ा के बारे में कुछ कहेंगें ?
 तीर्थ  महाराज : नहीं,  एक अच्छा प्रचार नहीं है. एक बार एक सवाल उठा  था: “यदि भौतिक जीवन पीड़ा  है और आध्यात्मिक जीवन पीडा है,तो दोनों में  क्या अंतर है?” तो जवाब आया: “भौतिक  जीवन एक बार समाप्त हो जाता है. लेकिन आध्यात्मिक जीवन शाश्वत है. “यह कहा जाता है कि आध्यात्मिक पीडा  ज्वालामुखी के  माग्मा की तरह जल रही  है, लेकिन उसी  समय यह शहद की तरह मीठा  है. तो इसके बिना जीना  बहुत मुश्किल है . लेकिन इस प्रकार की पीड़ा  – आध्यात्मिक पीडा  – हमें यह बिलकुल पता नहीं है  क्योंकि वह तो इतना भरपूर है ,  इतना पोषक है! इसलिए हम सभी को  भक्ति के दर्शन पर ध्यान देना चाहिए . , क्योंकि यह एक सस्ता प्रचार नहीं है की : “तुम बस जुड़ जाओ और आप प्रसन्न रहेंगें !” ठीक है, क्योंकि आमतौर पर लोग यह कहते हैं: “हमसे जुड़ें और आप प्रसन्न रहेंगे ”  आमंत्रण है क्या ? “हमसे  साथ जुड़ें और तुम पीड़ित होंगें  .” तो सोचो , अगर कोई उसकी प्रक्रिया के बारे में गंभीर है, तो यह अच्छा है,यह जांच करने के लिए वहाँ क्या छिपा हुआ  है.
 और श्रद्धालुओं की पीड़ा क्या है? “आह, मैं इतना गिर गया हूँ, मैं अपने प्रभु से इतनी दूरहूँ.” इस तरह की पीड़ा बहुत नाजुक है. दरअसल इस शब्द, यह अभिव्यक्ति वास्तव में उचित नहीं है – यह पीड़ा  नहीं है बल्कि यह है लालसा ,  लालसा …. यह एक बहुत मीठी लालसा है.
  पीड़ा , सीमित चेतना के भौतिक स्तर का  एक जरूरी हिस्सा है, और आध्यात्मिक मामलों में यह स्नेह की प्रकृति के अंतर्गत आताहै. इसलिए एक अच्छे  रोमांस  या  रोमांटिक फिल्म  में यदि पीड़ा न हो तो ,वह कहानी पूरी नहीं  है . इस भव में हमें यह समझना चाहिए कि आध्यात्मिक जीवन में एक रंग है , दुख का एक प्रकार है, जो सारी  कहानी को पूरा करता है.
 मुझे लगता है कि हम एक बार चर्चा कर रहे थे,  एक कहानी है जब शुकदेव गोस्वामी घर छोड़ रहे थे .शुकदेव  व्यास के बेटे थे . व्यास एक बहुत ही सम्मानित वयोवृद्ध साधु है और उनका  युवा पुत्र  पूर्णता  खोज रहा  है. और लड़का कहता है : “पिताजी, मैं पूर्णता की खोज में जा रहा हूँ . मैं आपको  छोड़ रहा हूँ ! मैं परमेश्वर की पूर्णता प्राप्त केलिए अपने  मोह को छोड़ रहा हूँ .”आप शुकदेव  के साहसी और  शक्तिशाली खोज को पसंद कर रहे हैं? हाँ, हम सब को पसंद आया, क्योंकि हम भी हमारी खोज शुरू करना चाहते हैं. और व्यास का क्या हुआ  …? वे कहते हैं:  “ओ  मेरे बेटे!”.केवल वृक्षों ने उनकी  पुकार सुनी   शुकदेव  जा रहा है, सब कुछ छोड़ कर  ….
  जब मैंने  पहली बार यह  कहानी पढ़ी -तब आप की ही उम्र का था – मैंने कहा: “हाँ! शुकदेव  सही है! जय  शुकदेव ! बूढ़े पिता को छोड़ दो! क्योंकि यह भी लिखा है कि: वह कोई विशेषज्ञ  नहीं है “वह जानता है ,  हो सकता है,वह नहीं जानता हो “. खुद के लिए खोजें “[*]  युवा जा रहा है और वृद्ध व्यक्ति रो रहा है . युवा,युवा के साथ सहमत होंगे. लेकिन जब आप बूढ़े  हो जाएँगे ,तब  आप उस  पिता के दुःख को महसूस कर सकेंगें  है, जो बेटे के लिए रो रहा है: ” मत जाओ, मेरे प्रिय  …” लेकिन गूंज पेड़ों में छा रही है -निष्फल.
 तो एक ही सत्य के  विभिन्न चरण,विभिन्न पहलु हैं. बलिदान के बिना कोई पूर्ति नहीं है. यह  अलगाव  का दर्द है. यही वह  दुख है,जिस  के बारे में  मैं बात कर रहा हूँ – दुख स्नेह की वजह से होता है . क्या यह एक मीठ दुःख है ?यह एक बहुत, बहुत गहऋ  भावनात्मक पीड़ा है, जो सारी कहानी को पूरा करता है. यह ,उस हर व्यक्ति को, जो इससे जुड़ा है ,उसे  कुछ आनंद देता है. और यह  लोगों के बीच संबंध की शुरुआत भर  है.
[*] शिव कहते हैं: -“अहम्  वेद्मि , शुको  वेत्ति , व्यास वेत्ति  न  वेत्ति  वा  ! मैं जानता हूँ कि शुक जानता है,हो सकता है  व्यास जानते हो,पर हो सकता है” भागवतम “का अर्थ न भी जानते हो !


(श्री भ.क.तीर्थ  महाराज, २००७ /०२ /२६  के व्याख्यान से उद्धृत , सोफिया)
आस्था हमारे अस्तित्व के   परम लक्ष्य को समझने की विधि है. विश्वास एक इंसानकी सबसे बड़ी शक्ति है. हम बार बार  कह  सकते हैं या हम वास्तव में, गहराई से महसूस कर सकते हैं कि “मैं भगवान का सेवक हूँ”. सतही पुनरावृत्ति  कुछ  नहीं है. सतही पुनरावृत्ति मदद नहीं करेगी . लेकिन अगर हम गहराई से खुद को समर्पित कर देते हैं , अगर हम वास्तव में ईश्वर पर निर्भर हैं ना कि अपनी  योजनाओं पर – तो यह काम करना शुरू कर देता  है.
कैसे यह विश्वास प्राप्त किया जाए : अगला सवाल यह होना  चाहिए? यदि विश्वास इतना मजबूत है और यह बहुत महत्वपूर्ण है कि यह कैसे प्राप्त हो , यह कैसे मिले ?
“भगवद गीता” में,  श्रीला  प्रभुपाद   का एक आशय यह  है कि आस्था  भक्तों के  सहयोग से आता है. तो हम विश्वास प्राप्त कर सकते हैं ,उनसे जिनके पास यह है, श्री गुरु के आशीर्वाद से और वे क्या सुझाव दे रहे हैं-उसके अभ्यास से  विश्वास प्राप्त कर सकते हैं. ये सभी बहुत महत्वपूर्ण तत्व हैं.क्योंकि अगर हम गहन  विश्वासी लोगों के साथ जुड़ते हैं तो हमें  भी गहन विश्वास  होगा.यदि आप ऐसे लोगों के साथ हैं , जो झिझक रहे हैं ,तो आप भी आप भी संकोच करेंगे. यदि आप शराबी के साथ हैं , आप एक शराबी होंगे , है ना? तो अपना सहयोगी चुनो. एक उच्च, आध्यात्मिक जुडाव को खोजने की कोशिश करें. यह हमारा  अतीत होना चाहिए, यह हमारा  वर्तमान हो  और यह हमारा  भविष्य होना चाहिए चाहिए- भक्तों के साथ संबद्ध.
एक बार जब श्रीला  भक्ति प्रोमोद  पुरी गोस्वामी महाराज से पूछा  गया – वे  एक सौ साल के पवित्र  संत थे : “महाराज, आप अस्सी साल से  भक्ति का अभ्यास कर रहे हैं, आप का  निष्कर्ष क्या है” उन्होंने एक क्षण के लिए सोचा  और कहा: “…भक्तों की संगत के बिना यह काम नहीं करता “यह उनका  निष्कर्ष था. कृपया, इस सलाह पर ध्यान देना. अच्छे , आध्यात्मिक, उच्च  संघ के बिना, यह बहुत, बहुत कठिन  है. इसलिए हमें  एक सकारात्मक वातावरण कि खोज करनी  चाहिए – एक ऐसी संगत  हमारे विकास में मदद करती  है .-रक्षा करती है ,मदद करती है ,उसे बढाती है …….पोषक संगत . क्यों?क्योंकि अगर तुम एक विरोधी वातावरण में बढ़ते हो , तो आप अस्तित्व के लिए इतनी अधिक अपनी ऊर्जा  बर्बाद कर देते हो, विकास में इसे नहीं लगाते हो.
लेकिन वह भी सच है,  हमारे एक मित्र ने आज कहा : “मेरी  प्रतिरक्षा प्रणाली बहुत मजबूत है, क्योंकि मुझ पर बहुत बुरे असर रहे क्योंकि ने मैंएक मुश्किल जीवन जिया  है “यह भी सच है,  कि यह मदद करता है. लेकिन अगर तुम काफी भाग्यशाली  हो कि यह पोषक  वातावरण मिल रहा है , तो भगवान को  “धन्यवाद” कहें .अगर वह तुम्हें ऐसे हालात में डालता है, तो उसके आभारी हो  और इसके प्रति प्रसन्न  भाव  रखो  . यदि वह आप को नारकीय  तूफान में डालता है, इस में खुश और आभारी हो.
और यह मत भूलो ,  सतही पुनरावृत्ति पर्याप्त नहीं है. हमेशा उन  साधारण महिलाओं की  कहानी याद रखो , जो पानी ले जा रही  थी . एक उच्च कोटि के  गुरुजी एक नदी के किनारे पर बैठे हुए थे . वे एक बड़ी भीड़ को प्रवचन दे रहे थे .वे लोग  थे, बहुत हीआध्यात्मिक और सभी  पूरा ध्यान दे रहे थे . बस  आप की तरह, संदेश का इंतज़ार कर रहे थे  गुरुजी कह रहे थे : “मत भूलो , राम नाम, राम के  पवित्र नाम से,आप भव सागर को पार कर सकते हैं.” भीड़ मंत्रमुग्ध थी :”बहुत खूब! !  गुरुजी महान  है, “हर कोई अपने घर संतुष्ट भाव से गया और  तभी वे महिलाए, जो अपने  सिर पर बड़े बर्तन में पानी ले जा रही थी ,वहां से गुजर रही थीं ,जब गुरुजी ये बड़ा वाक्य कह रहे थे : “राम नाम करके आप सामग्री के अस्तित्व को पार कर सकते हैं” तो अगली बार वे महिलाऐं फिर से नदी पर आयीं  और वे दूसरी ओर पार करना चाहती थीं . लेकिन केवट सो गया था, तो नाव लेना असंभव था. तब वे सोचने लगीं : “अब क्या करें ?” और उनमें से एक ने कहा: “अरे, तुम्हें याद है? स्वामीजी ने कहा कि राम नाम के द्वारा हम भव सागर पार कर सकतेहैं! चलो कोशिश करते हैं, यह सिर्फ एक छोटी नदी है, ” वे सहमत हो गयीं :” आह! यह एक बहुत अच्छा विचार है, हम कोशिश करें ! राम! राम! राम … “नदी पार! तो वे ध्यान दे रही थीं . वे विश्वास के साथ अभ्यास कर रहीं थीं   और जब वे नदी पार कर रही थी.गुरुजी  उस समय नदी के दूसरे किनारे  पर ध्यान कर रहे थे . उन्होंने  नदी की सतह परचलने वाली महिलाओं को राम नाम जपते हुए देखा  और उन्होंने कहा: “हाँ! मैं इतना महान हूँ.देखा , बस मेरी सलाह द्वारा, वे नदी पर चल सकती  हैं.मुझमें कितना बल है ! मैं भी नदी पार कर सकता हूँ  ” वह तुरंत कूद गया और नदी पार करने की कोशिश की,लेकिन मौके पर ही डूब गया क्योंकि वह वास्तव में जो  कह रहा था,उस पर उसे  विश्वास नहीं था. इसलिए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण नियम  है: तुम अपने आपउस सलाह को बहुत गंभीरता से  लो जिसे आप दूसरों को बाँट  रहे हैं . पहले करो फिर बताओ.
यह विश्वास की शक्ति है. यह शुद्ध अभ्यास की शक्ति है. यह  भौतिक अस्तित्व के दुख सागर को पार करने का तरीका है.


अतीत, वर्तमान और भविष्य – ये   प्राणियों की परिवर्तित  परिस्थितियां हैं.फिर भी वहाँ कुछ स्थायी है. वह  स्थायित्व क्या है?  अगर हम अस्तित्व पर ध्यान केन्द्रित करते हैं –उसका आरंभ,रखरखाव और अंत-इसमें कुछ स्थायित्व है और वह स्थायित्व क्या है ?उदाहरण के लिए, एक शरीर ले – हम पैदा होते हैं, हम जी  रहे हैं, हम मर रहे हैं पर कुछ तो स्थायी है.यह स्थायित्व क्या है? यह है आत्मा.और इस आत्मा को कैसे अनुभव करें?कैसे इसे पकड़ सकते हैं? हम लक्षण द्वारा आत्मा की पहचान कर सकते हैं. लक्षण क्या हम देख सकते हैं? जीवन वहाँ है, लेकिन जीवन ही नहीं अनुभव कर सकते हैं. जीवन मौजूद है, लेकिन वह खुद को नहीं समझ सकता. इसके अलावा भी कुछ और है और वह है चेतना . चेतना खुद के लिए खोज कर सकते हैं. वहाँ कोई है, जो खोज है, जो समझने की कोशिश कर रहा है होना चाहिए. और अगर वहाँ इस चेतना है, चेतना देखते हैं, कर सकते हैं अपने मूल का पालन कर सकते हैं – यह अस्तित्व है. एक अर्थ में हम कह सकते हैं कि अस्तित्व चेतना के अतीत है. यदि अस्तित्व चेतना के अतीत है, तो चेतना का भविष्य क्या है?अस्तित्व  अतीत है अर्ताथ यह है मूल.चेतना का मूल अस्तित्व है .भविष्य क्या है ,चेतना का लक्ष्य क्या है?आत्मा को सिद्ध करना .और फिर क्या होता है?हम ईश्वर के पास  लौट  जाते हैं.किस रूप में?किस अवस्था में?आप गोलोक वृन्दावन में जाते हैं?दुखी हो कर,मूंह लटकाए हुए?ठीक है,हमें नहीं पता किहम आध्यात्मिक नभ में कैसे प्रवेश करेंगें.पर इस पर ध्यान दें.   “भगवद -गीता ” में कहा गया है कि इस  प्रक्रिया का अभ्यास  ख़ुशी से किया जाता है. सुसुखं  कर्तुम  अव्यय  –  प्रक्रिया का अभ्यास  आनंद से किया जा सकता  है. और यह हमें आत्मा के मूल आनंद के निकट लाएगा. तो हम कह सकते हैं कि भविष्य, या चेतना का लक्ष्य , आनंद है, आनन्दम. सत अस्तित्व है-हमारा अतीत है ,यह हमारा स्रोत है. हमारी पहचान, चित , चेतना -खोज रहा है, अपने आपको , अपने होने को .अपने लक्ष्य को और चेतना का लक्ष्य है आनंद, खुशी, आनन्दम.
यह बताता भी है और अलग श्रेणी भी पता चलती है- आध्यात्मिक विकास के  विभिन्न चरणों की स्वीकृति . क्योंकि पहले हमें  खुद को चेतना के रूप में में पहचानना है  – मुझे लगता है, इसलिए मैं हूँ. जैसे डकार का कहना था’““Cogito ergo sum”मुझे लगता है ,अत:मैं हूँ- सौ सालों तक इस दर्शन पर बने रहने के बाद वे इस नारे को कैसे बदल सकते हैं?   “Dubito ergo sum – “मुझे संदेह है ,इसलिए मैं हूँ.” यह भौतिक दशा  है. तुम अपने आप को काम पर शक करके अपनी  पहचान करोगे . जरा कल्पना करो कि यह किस तरह की पहचान है: मुझे शक है, इसलिए मैं हूँ.यह मेरा स्वभाव है, मुझे शक हो रहा  है, यह है कि मैं क्या हूँ, मैं  शक कर रहा हूँ. मैं एक बड़ा प्रश्न चिह्न हूँ. तो मैं वैष्णव तिलक  इस तरह नहीं लगाता हूँ , बल्कि  एक प्रश्न चिह्न के तरह लगाता हूँ.यह मेरी पहचान है. यह मेरा  संप्रदाय है – यह प्रश्न चिह्न है.
बौद्धिक विधि से  हम अस्तित्व के बारे में थोडा सा जान सकते हैं , इस बारे में नहीं जान सकते.. तो हमे  बहुत बुद्धिमान होना चाहिए यह समझने के लिए यह वह मार्ग नहीं है और इसे पाने के लिए है  विश्वास, गहरी आस्था तरीका है –यह समझने के लिए की  क्या खुशी है, क्या है आनंद . और, अगर हम गहरे विश्वास के भगवान के नाम का जप करते है तो निश्चित रूप से हमारी चेतना बदल जाएगी . इस जादुई कालीन प्रभाव है. तुम कालीन पर बैठते हो  और जब  मंत्र का जाप शुरू करते हो , तो तुम  बस उड़ रहे हो . यह तुरंत तुम्हें  चेतना के एक अलग स्तर पर ले आता है .
वैसे भी, चेतना हमारी पहचान है, यह है कि हम क्या अनुभव कर सकते हैं. इसलिए यह  खोज भी एक सचेत खोज है, यह शुरू में एक बौद्धिक खोज है. अगर हम मुड कर देखें , हमारे स्रोत खोजने के लिए, हमारे अतीत को खोजने की कोशिश करें तब एक बौद्धिक खोज, एक उचित खोज का उपयोग करें. यह अस्तित्व को समझने के लिएरास्ता है. और आनन्दम को  समझने के लिए रास्ता क्या है? हमें  एक ही तर्कसंगत पद्धतिलागू करनी  चाहिए? आह, यह एक काव्यात्मक  सवाल है. एक ही विधि काम नहीं करेगी  क्योंकिआनन्दम तर्कहीन है. तो क्या हम दूसरी विधि लागू कर सकते हैं?  हम भविष्य और चेतना के लक्ष्य के शोध के लिए कौन सी विधि प्रयोग कर  सकते हैं? मैं कहूँगा, हमें  विश्वास के साथ हमारे लक्ष्य की खोज करनी चाहिए. अगर हम अनुसंधान की विधि के रूप में विश्वास का प्रयोग करते हैं ,उस विधि के रूप में ,जिसमें शोध किया जा सकता है तो हमेंआध्यात्मिक प्रसन्नता  मिल जाएगी.
आनंद – यह अस्तित्व की पूर्ति है. हम कह सकते हैं कि अस्तित्व  की सर्वोपरि  उपलब्धि चेतना है, और चेतना का  शीर्ष अनुभव आनंद है. हमेशा श्रद्धालुओं कि संगत में रहने का प्रयत्न करें ,स्वयं को सेवा में समर्पित कर दें ,अपने आध्यात्मिक मास्टर के निर्देशों का पालन करें ईश्वर की आराधना करें और आपको परिणाम दिखाई देने लगेंगे.


(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६  .०२ .२००७ , सोफिया )
समय के तीन चरण, अतीत, वर्तमान और भविष्य हैं. और हालांकि हम इन तीन चरणों की बात करते हैं, वे वास्तव में मौजूद नहीं है. क्या आपका कोई  अतीत है? नहीं,विगत चला गया है, इसलिए यह अस्तित्वहीन है . भविष्य  अस्पष्ट है. इसलिए यह है नहीं. यह केवल वर्तमान क्षण है, लेकिन जब मैं कहता हूँ “वर्तमान क्षण”, यह पहले ही चला गया है. हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं: कुछ होता नहीं  है. इसलिए समय नहीं है.क्या  समय है? अचिन्त्य  भेदाभेदा  तत्त्व  – हाँ और नहीं भी – एक साथ  . निरपेक्ष भाव में समय मौजूद नहीं है, अभी हम देखते हैं कि समय यहाँ है  और गुजर रहा है. कई लोगों का कहना है कि समय गुजर रहा है, जबकि समय हँस रहा है और देखता है कैसे मनुष्य गुजर रहे हैं.
हमें समझना चाहिए कि समय ,परम  प्रभु की  एक ऊर्जा है और यह एक समाप्त होती ऊर्जा के रूप में भौतिक मंच पर प्रकट होता   है. समय इस तरह का  एक कारक  है जो कि चीजों के घटने  का  अनुक्रम प्रदान करता है. वर्तमान अतीत का भविष्य और   भविष्य का अतीत  है. यदि आप वर्तमान क्षण को समझ लेते हैं तो  आप भूत और  भविष्य को समझ लेते  हैं. यदि आप को वर्तमान क्षण का पूरा ज्ञान है, तो आप समझ सकते हैं कि क्या चला गया है और क्या आने वाला है . हमने  यदि एक उचित तरीके से  अपने  समय का उपयोग किया है. और अगर हम भगवान की स्तुति के लिए इस  वर्तमान क्षण का उपयोग करें, तो हम अतीत जानते हैं और हमें भविष्य का भी  पता है. इसलिए यह  स्थायी वचनबद्धता होनी चाहिए.
समय क्या है,इसे समझने के विभिन्न स्तर हैं.फिर भी कुछ स्थाइत्व होना चाहिए. कृष्ण-सेवा में स्थायी  वचनबद्धता का अर्थ है  पूर्ण अनुराग. पूर्ण अनुराग,पूर्ण स्वतंत्रता के साथ  क्यूंकि  पूर्ण वचनबद्धता संसार के विभिन्न संस्थानों में मिल सकती है.जैसे कि आप सेना में भारती हो जाते हैं तो वे आप को पूरा काम देते हैं . या फिर आप यदि जेल में है तो भी आप व्यस्त हैं -पूर्ण रूप से . और यदि आप लोहे की सलाखों के दूसरी ओर हैं – माया का बंदीगृह – तब यह स्वतंत्रता खलती है-तब भी आप पूरी तरह से बंधे हुए हैं ,हम हर समय व्यस्त हैं .लेकिन साधारण व्यस्तता और धार्मिक  व्यस्तता भिन्न हैं. इन संस्थानों द्वारा दी गयी व्यस्तता जबरदस्ती की है. आपको आदेश मिलता है और आपको उसका पालन करना है .भ्रम छली होता है,वह इस तरह से आदेश देता है की आप खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं.
तुम्हें लगता है कि “मैं कर सकता हूँ! मैं इस तरह या उस तरह का चुनने के लिए  मुक्त हूँ. “लेकिनवास्तव में हम प्रकृति की शक्तियों द्वारा संचालित होते  हैं और भ्रम का जादू हमें चला  रहा होता है. इसलिए केवल बल द्वारा या इस जादू से जुड़ा होना पर्याप्त नहीं है. हमें  अपनी स्वतंत्र इच्छा से जुड़ना  है. हमें  ‘हां’ कृष्ण को कहना है. यदि सेवा बल द्वारा हासिल की गयी  है, तब हमारा  “ध्यान” इस पर होगा कि किस प्रकार इस वचनबद्धता को तोड़ दिया जाए. लेकिन अगर हम कहें और हम सहमत हैं: “हाँ! मैं करना चाहता हूँ! में यहाँ रहना चाहता हूँ मैं मदद करना चाहता हूँ, मुझे क्या करना है? बताइए  “तो अगर हम उचित आदमी हैं, तो हम यह कर जाएगें . पूर्ण वचनबद्धता  के साथ पूर्ण स्वतंत्रता: यह  भक्ति सेवा में सबसे अच्छासंयोजन है. कृष्ण के विचारों, गतिविधियों, शब्दों में स्थायी वचनबद्धता  – अतीत, वर्तमान और भविष्य में. जब भी आप मुसीबत में हो या  खुशी होती है, तुम बाहर कॉल कर सकते हैं: “जय  राधे श्याम!” स्थिति बदल जाएगी. दुख चला जाएगा. और खुशी भी चली जायगी ? नहीं ,खुशियाँ  बढती जाएँगी.
भगवान के पवित्र नामों के  जप से ,  वह सब कुछ ,जो अशुभ है, दूर हो जाता है. कई लोग  अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं. आपको  पता है कि आपका  अतीत आपके  बाएं हाथ पर लिखा हैऔर आपका  भविष्य  आपके  दाहिने हाथ पर लिखा है. लेकिन अगर आप अपने अतीतऔर अपने भविष्य को बदलना चाहते हैं, तो एक सुझाव है. बस ताली बजें ,जब एक कीर्तन होता है. क्योंकि तब आपकी हथेलियों की रेखाएं बदल जाएंगी और वह सब कुछ ,जो अशुभ है,वह दूर हो जाएगा .
भगवान की सेवा में स्थायी लगन   – यही  भक्ति योग का लक्ष्य है.  व्यस्तता केवल बलपूर्वक नहीं  ,बल्कि  मुक्त समर्पण द्वारा हो . “मैं यहाँ हूँ, मुझे आपकी सेवा में संलग्न होना  है .” हरे कृष्णमहामंत्र एक निमंत्रण की तरह है. जब आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, एक अतिथि की तो आप एक अच्छा पोस्टर बनाते हैं, अपने प्रवेश द्वार को सजाते हैं  और  कहते हैं “आपका स्वागत है!” तो फिर आपका  मेहमान आता है और आप  उसे एक  कप पानी भी नहीं  देते.  अतिथि को  कैसा लगेगा? वे  कहेंगे: “ठीक है, यह एक बहुत अच्छा आमंत्रण है, लेकिन बहुतखराब सत्कार . बेहतर है कि मैं चल जाऊं.  वे सच में मुझे  यहाँ नहीं चाहते  “उसी तरह, आप अपने ह्रदय को पोस्टर से सजाते हो:”. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “, लेकिन जब कृष्ण आपके ह्रदय में प्रवेश करते हैं तो आप उनकी जरा भी सेवा नहीं करते हैं.?!  जैसा कि  वे  ‘गीता’ में कहते हैं: “.बस थोड़ा सा जल , एक छोटा सा फल, एक  पत्ती और मैं संतुष्ट हो जाता  हूँ” अगर हम भगवानको आमंत्रित करते हैं ताकि  हम सेवा में संलग्न हों , तो हमें  सेवा में शामिल होने के लिए तैयार रहना चाहिए. केवल कहना,  यह पर्याप्त   नहीं है . हमें तैयार रहना होगा. यदि हम अपनी इच्छा दे, अगरअपनी इच्छा  हम कृष्ण के लिए दे दें : “हाँ, मैं जुड़ना चाहता हूँ , तो मेरी देखभाल आपके हाथ है ,” तो वे  ख्याल रखेंगे. और भूलो  नहीं कि यह  है, नि: स्वार्थ समर्पण एक आनंद है. यह सबूत आप न केवल किताबों में पढ़ सकते हैं, बल्कि यह सबूत आप भक्तों के चेहरे पर पढ़ सकते हैं.
एक बार किसीने  एक शिक्षक से पूछा: “यह कैसे हुआ कि पवित्र नाम का मीठा अमृतमेरे होठों पर कड़वाहट  में  बदल गया है?” तो शिक्षक ने कहा: यह केवल पवित्र नाम ही नहीं है .”अगर कुछ बदला जा सकता है, अगर  मैं  कुछ  अनुभव करता हूँ  और फिर मैं इसे खो देता हूँ  – तो यह एक वास्तविक अनुभव नहीं था. आरम्भ , बदलाव , समाप्ति  – यह हमारी समझ के अनुसार भौतिकता  है .लेकिन आध्यात्मिक बातें  स्थायी, शाश्वत और सदा बढ़ती जाती हैं.. और कभी -कभी हमें फिर से  यह सोचना चाहिए – हमने  क्या देखा है, हमने  क्या हासिल किया है, कितना हम समझ चुके हैं, कितना हमने  आत्मसमर्पण कर दिया है. क्योंकि दस प्रतिशत आत्मसमर्पण द्वारा आपको नब्बे प्रतिशत परिणाम प्राप्त नहीं होगा, है ना? कृष्ण एक अच्छे  व्यापारी है. लेकिन सौभाग्य से आपके एक अधिकृत डीलर है और ये चैतन्य महाप्रभु हैं . आप केवल दसप्रतिशत भुगतान करते हैं और आप को एक सौ  आठ प्रतिशत लाभ मिलता है. क्योंकि वे  दया के  वितरक है. इसलिए कृपया, मंदिर के लिए अपने समर्पण का कुछ दस प्रतिशत लाओ  और इसे उनके  कमल चरणों में चढ़ा दो. तुम्हे इससे  कई गुना अधिक मिलेगा .

(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २६  .०२ .२००७ , सोफिया )  समय के तीन चरण, अतीत, वर्तमान और भविष्य हैं. और हालांकि हम इन तीन चरणों की बात करते हैं, वे वास्तव में मौजूद नहीं है. क्या आपका कोई  अतीत है? नहीं,विगत चला गया है, इसलिए यह अस्तित्वहीन है . भविष्य  अस्पष्ट है. इसलिए यह है नहीं. यह केवल वर्तमान क्षण है, लेकिन जब मैं कहता हूँ “वर्तमान क्षण”, यह पहले ही चला गया है. हम निष्कर्ष निकाल सकते हैं: कुछ होता नहीं  है. इसलिए समय नहीं है.क्या  समय है? अचिन्त्य  भेदाभेदा  तत्त्व  – हाँ और नहीं भी – एक साथ  . निरपेक्ष भाव में समय मौजूद नहीं है, अभी हम देखते हैं कि समय यहाँ है  और गुजर रहा है. कई लोगों का कहना है कि समय गुजर रहा है, जबकि समय हँस रहा है और देखता है कैसे मनुष्य गुजर रहे हैं.
हमें समझना चाहिए कि समय ,परम  प्रभु की  एक ऊर्जा है और यह एक समाप्त होती ऊर्जा के रूप में भौतिक मंच पर प्रकट होता   है. समय इस तरह का  एक कारक  है जो कि चीजों के घटने  का  अनुक्रम प्रदान करता है. वर्तमान अतीत का भविष्य और   भविष्य का अतीत  है. यदि आप वर्तमान क्षण को समझ लेते हैं तो  आप भूत और  भविष्य को समझ लेते  हैं. यदि आप को वर्तमान क्षण का पूरा ज्ञान है, तो आप समझ सकते हैं कि क्या चला गया है और क्या आने वाला है . हमने  यदि एक उचित तरीके से  अपने  समय का उपयोग किया है. और अगर हम भगवान की स्तुति के लिए इस  वर्तमान क्षण का उपयोग करें, तो हम अतीत जानते हैं और हमें भविष्य का भी  पता है. इसलिए यह  स्थायी वचनबद्धता होनी चाहिए. समय क्या है,इसे समझने के विभिन्न स्तर हैं.फिर भी कुछ स्थाइत्व होना चाहिए. कृष्ण-सेवा में स्थायी  वचनबद्धता का अर्थ है  पूर्ण अनुराग. पूर्ण अनुराग,पूर्ण स्वतंत्रता के साथ  क्यूंकि  पूर्ण वचनबद्धता संसार के विभिन्न संस्थानों में मिल सकती है.जैसे कि आप सेना में भारती हो जाते हैं तो वे आप को पूरा काम देते हैं . या फिर आप यदि जेल में है तो भी आप व्यस्त हैं -पूर्ण रूप से . और यदि आप लोहे की सलाखों के दूसरी ओर हैं – माया का बंदीगृह – तब यह स्वतंत्रता खलती है-तब भी आप पूरी तरह से बंधे हुए हैं ,हम हर समय व्यस्त हैं .लेकिन साधारण व्यस्तता और धार्मिक  व्यस्तता भिन्न हैं. इन संस्थानों द्वारा दी गयी व्यस्तता जबरदस्ती की है. आपको आदेश मिलता है और आपको उसका पालन करना है .भ्रम छली होता है,वह इस तरह से आदेश देता है की आप खुद को स्वतंत्र महसूस करते हैं.तुम्हें लगता है कि “मैं कर सकता हूँ! मैं इस तरह या उस तरह का चुनने के लिए  मुक्त हूँ. “लेकिनवास्तव में हम प्रकृति की शक्तियों द्वारा संचालित होते  हैं और भ्रम का जादू हमें चला  रहा होता है. इसलिए केवल बल द्वारा या इस जादू से जुड़ा होना पर्याप्त नहीं है. हमें  अपनी स्वतंत्र इच्छा से जुड़ना  है. हमें  ‘हां’ कृष्ण को कहना है. यदि सेवा बल द्वारा हासिल की गयी  है, तब हमारा  “ध्यान” इस पर होगा कि किस प्रकार इस वचनबद्धता को तोड़ दिया जाए. लेकिन अगर हम कहें और हम सहमत हैं: “हाँ! मैं करना चाहता हूँ! में यहाँ रहना चाहता हूँ मैं मदद करना चाहता हूँ, मुझे क्या करना है? बताइए  “तो अगर हम उचित आदमी हैं, तो हम यह कर जाएगें . पूर्ण वचनबद्धता  के साथ पूर्ण स्वतंत्रता: यह  भक्ति सेवा में सबसे अच्छासंयोजन है. कृष्ण के विचारों, गतिविधियों, शब्दों में स्थायी वचनबद्धता  – अतीत, वर्तमान और भविष्य में. जब भी आप मुसीबत में हो या  खुशी होती है, तुम बाहर कॉल कर सकते हैं: “जय  राधे श्याम!” स्थिति बदल जाएगी. दुख चला जाएगा. और खुशी भी चली जायगी ? नहीं ,खुशियाँ  बढती जाएँगी.भगवान के पवित्र नामों के  जप से ,  वह सब कुछ ,जो अशुभ है, दूर हो जाता है. कई लोग  अपने भाग्य को बदलना चाहते हैं. आपको  पता है कि आपका  अतीत आपके  बाएं हाथ पर लिखा हैऔर आपका  भविष्य  आपके  दाहिने हाथ पर लिखा है. लेकिन अगर आप अपने अतीतऔर अपने भविष्य को बदलना चाहते हैं, तो एक सुझाव है. बस ताली बजें ,जब एक कीर्तन होता है. क्योंकि तब आपकी हथेलियों की रेखाएं बदल जाएंगी और वह सब कुछ ,जो अशुभ है,वह दूर हो जाएगा .भगवान की सेवा में स्थायी लगन   – यही  भक्ति योग का लक्ष्य है.  व्यस्तता केवल बलपूर्वक नहीं  ,बल्कि  मुक्त समर्पण द्वारा हो . “मैं यहाँ हूँ, मुझे आपकी सेवा में संलग्न होना  है .” हरे कृष्णमहामंत्र एक निमंत्रण की तरह है. जब आप प्रतीक्षा कर रहे हैं, एक अतिथि की तो आप एक अच्छा पोस्टर बनाते हैं, अपने प्रवेश द्वार को सजाते हैं  और  कहते हैं “आपका स्वागत है!” तो फिर आपका  मेहमान आता है और आप  उसे एक  कप पानी भी नहीं  देते.  अतिथि को  कैसा लगेगा? वे  कहेंगे: “ठीक है, यह एक बहुत अच्छा आमंत्रण है, लेकिन बहुतखराब सत्कार . बेहतर है कि मैं चल जाऊं.  वे सच में मुझे  यहाँ नहीं चाहते  “उसी तरह, आप अपने ह्रदय को पोस्टर से सजाते हो:”. हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ,हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे “, लेकिन जब कृष्ण आपके ह्रदय में प्रवेश करते हैं तो आप उनकी जरा भी सेवा नहीं करते हैं.?!  जैसा कि  वे  ‘गीता’ में कहते हैं: “.बस थोड़ा सा जल , एक छोटा सा फल, एक  पत्ती और मैं संतुष्ट हो जाता  हूँ” अगर हम भगवानको आमंत्रित करते हैं ताकि  हम सेवा में संलग्न हों , तो हमें  सेवा में शामिल होने के लिए तैयार रहना चाहिए. केवल कहना,  यह पर्याप्त   नहीं है . हमें तैयार रहना होगा. यदि हम अपनी इच्छा दे, अगरअपनी इच्छा  हम कृष्ण के लिए दे दें : “हाँ, मैं जुड़ना चाहता हूँ , तो मेरी देखभाल आपके हाथ है ,” तो वे  ख्याल रखेंगे. और भूलो  नहीं कि यह  है, नि: स्वार्थ समर्पण एक आनंद है. यह सबूत आप न केवल किताबों में पढ़ सकते हैं, बल्कि यह सबूत आप भक्तों के चेहरे पर पढ़ सकते हैं.एक बार किसीने  एक शिक्षक से पूछा: “यह कैसे हुआ कि पवित्र नाम का मीठा अमृतमेरे होठों पर कड़वाहट  में  बदल गया है?” तो शिक्षक ने कहा: यह केवल पवित्र नाम ही नहीं है .”अगर कुछ बदला जा सकता है, अगर  मैं  कुछ  अनुभव करता हूँ  और फिर मैं इसे खो देता हूँ  – तो यह एक वास्तविक अनुभव नहीं था. आरम्भ , बदलाव , समाप्ति  – यह हमारी समझ के अनुसार भौतिकता  है .लेकिन आध्यात्मिक बातें  स्थायी, शाश्वत और सदा बढ़ती जाती हैं.. और कभी -कभी हमें फिर से  यह सोचना चाहिए – हमने  क्या देखा है, हमने  क्या हासिल किया है, कितना हम समझ चुके हैं, कितना हमने  आत्मसमर्पण कर दिया है. क्योंकि दस प्रतिशत आत्मसमर्पण द्वारा आपको नब्बे प्रतिशत परिणाम प्राप्त नहीं होगा, है ना? कृष्ण एक अच्छे  व्यापारी है. लेकिन सौभाग्य से आपके एक अधिकृत डीलर है और ये चैतन्य महाप्रभु हैं . आप केवल दसप्रतिशत भुगतान करते हैं और आप को एक सौ  आठ प्रतिशत लाभ मिलता है. क्योंकि वे  दया के  वितरक है. इसलिए कृपया, मंदिर के लिए अपने समर्पण का कुछ दस प्रतिशत लाओ  और इसे उनके  कमल चरणों में चढ़ा दो. तुम्हे इससे  कई गुना अधिक मिलेगा .



(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २५ .०२ .२००७ , सोफिया )
यदि दीक्षा से मैं एक शुद्ध भक्त  में परिवर्तित हो  जाता  हूँ -मेरा दिल सोने का हो जाए   – तो मुझे इसे लेना ही है ! लेकिन फिर अगला  प्रश्न उठता है -उस अधिकारिक व्यक्तित्व को किस प्रकार मिला जाए,कैसे  ढूंडा जाए? एक बार मेरे एक प्रिय गुरुभाई ने कहा : “ओह, मैंने इसके लिए  भारत जाने का फैसला किया है .मैं अपने मास्टर की  खोज  करना चाहता हूँ “लेकिन भारत जाने के बदले, वह ,   अपने गुरुदेव को ढूँढने  के लिए , नंदा फलवा फार्म के  लिए चल पड़ा – जो  सिर्फ तीस किलोमीटर की दूरी पर था , तीन हजार किलोमीटर  नहीं.
खोज, आन्तरिक खोज  होनी चाहिए. और जब मैं अपनी संभावनाओं की  धार पर अकेले पहुंचा हूँ , तो मुझे कुछ  कुछ अन्य मार्गदर्शन लेना है , किसी और  उच्च स्थल   से. लेकिन  हो क्या रहा है:आपको  एक निमंत्रण मिला, तो आपको यह  बहुत पसंद आता है और यह इतना रोमांचक है -कि आप कूदने लगते हैं क्या आप कुछ  जानते है,आपके लिए क्या   इंतज़ार कर रहा है ? क्या आपको मालूम भी है कि भक्ति परिधि के भीतर क्या है? क्या तुम्हें यकीन है कि यह आपके लिए है भी या नहीं ?क्या गुरु-सेवा के लिए आप सारा जीवन समर्पित कर सकते हो?ये बड़े प्रश्न हैं .
लोग  गुरुओं की जांच करने के आदी हो गए हैं . उनके गुण क्या हैं, वे किस तरह की योग्यताओं वाले हैं , वे ऐसे हों,वेसे हों….. क्योंकि मैं इतना महान हूँ कि मुझे  सबसे अच्छा गुरु चाहिए , जो शास्त्रों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता हो . लेकिन अगर मैं आप को उन सभी गुणों के विषय में बताऊँ,जिनकी  एक शिष्य से अपेक्षा की जाती है…किसी को भी उस सूची में रुचि नहीं है.अच्छा है उसे भूल ही जाएँ.पर आपको ज़रा थोडा सा आइडिया दे दूं- भावी शिष्य मेरा मतलब है उम्मीदवार  कोशिक्षित,युवा,स्वस्थ,संपन्न,बुद्धिमान,हार प्रकार सर उत्तमऔर पूर्ण रूप से समर्पण के लिए तैयार होना चाहिए.किस्में हैं ये सभी योग्यताएं?पर तब आप भी पूछ सकते हैं:अगर कोई इतना ही उत्तम है तो उसे गुरु की आवश्यकता ही क्या है?!
तब किसी चमत्कारिक प्रबंध  से आप मास्टर से मिलते हैं और उनसे कहते हैं:”मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ.”अपने ह्रदय  की गहराई  से मैं तुम्हें  सुझाव देता हूँ : अगर कोई आप से मिलता है और कहता  हैं: “तुम्हें तो  मेरा  शिष्य होना चाहिए” तो उस से बचने की कोशिश करना या सीमा में रहो .जांच करो : “क्यों?” क्योंकि शास्त्रीय कहानियों में यह थोड़ा अलग है. सिर्फ इसके कि अगर आप को प्रभु यीशु मिलते हैं और वे आप से कहते हैं  कि आप “मेरे पीछे आओ!” तो यह करो  ! यह करो! संकोच मत करो! पीटर की तरह मत बनो. प्रभु  ने उस से कहा: आओ मेरे पीछे आओ!और उन्होंने कहा: ” लेकिन मेरे जाल के बारे में क्या करू ?” ” मेरे आतंरिक -जाल  के बारे में क्या करूं ” – 21 वीं शताब्दी में पीटर कहते हैं… “अपने इन्टरनेट के बारे में क्या करूं ” बस आओ ! मेरे पीछे आओ ! “कोई बात नहीं, कुछ सोचो नहीं ​​. अपने मोह को त्याग दो ., मेरे साथ आओ. “
लेकिन  संत, शिक्षक , और उस क्षमता के प्रतिनिधि बहुत कम प्रकट  होते  हैं. भारतीय परंपरा में विभिन्न  कहानियां कही जाती हैं – जब चेले अपने मास्टर से   मिलने और उनके खोज के लिए इतने  उत्सुक होते  हैं. एक कहानी  नरोत्तम  दास ठाकुर और लोकनाथ  दास गोस्वामी की कहानी है. लोकनाथ का अर्थ है   “संसार का स्वामी” . वह बहुत ही त्यागी व्यक्ति था- हमेशा अपने अभ्यास  के लिए समर्पित,बहुत लोगों से मिलना नहीं,समय बर्बाद नहीं करना  ,इसलिए उन्हें  एक महान संत माना जाता था. वहाँ एक संभावित उम्मीदवार था – यह थे भविष्य के नरोत्तम  दास.उन्होंने तय किया: “लोकनाथ !वे ही  मेरे गुरु होगें  “तो उन्होंने  मास्टर से संपर्क किया, वे उसके पास गए और कहा: . “अरे गुरु, मुझ पर दया हो, कृपया मुझे अपने  शिष्य के रूप में स्वीकार कर लें “उन्होंने कहा:”यहाँ से बाहर हो  जाओ! यह मेरा काम नहीं है. मैं योग्य नहीं हूँ. संतों के पास जाओ.  बहुत सारे महान संतों यहाँ हैं ,उनसे मिलो .उनके पास जाओ. मैं शिष्यों को स्वीकार नहीं करता . “” नहीं, नहीं, नहीं, मैंआपका अनुयायी बनना चाहता हूँ ! कृपया “” नहीं! बिल्कुल नहीं!तुम ऐसा नहीं कर सकते “और उन्होंने इस युवक को अस्वीकार कर दिया .
बस अपने आप कल्पना कीजिए : आप एक महान संत के पास जाते हैं और  आप  आते हैं  अपने जीवन के साथ – यह आपकी सर्वोच्च   भेंट है-आप के पास जो कुछ भी है  सब कुछ.
. आप कहते हैं: “कृपया, मेरी ज़िंदगी स्वीकार करें “, और तब वह व्यक्ति  कहता है: “ए! यहाँ से निकल जाओ. वापस जाओ, मुझे परेशान मत करो.” हा?! आपका क्या भाव  है ?लग रहा है? आप जला हुआ सा  महसूस करते हैं .और आम तौर पर ऐसे क्षणों पर  पश्चिमी देशों वाले भाग खड़े होते है : “नहीं, मैं गलत था, वे  मेरे मास्टर  नहीं है. उन्होंने मुझे निराश किया है ! “
लेकिन नरोत्तम  अलग तरह के थे . उन्होंने कहा: “ओह! मेरे गुरुदेव इतने महान है! वह मेरी परीक्षा करना चाहते हैं , यह  देखने के लिए कि  मेरा  समर्पण असली है या नहीं . लेकिन तब क्या किया जाए ?” वह दार्शनिक रूप से बहुत अच्छी तरह से शिक्षित थे  और उन्होंने कहा:” मुझे अपने मास्टर को प्रसन्न करना है.यही एक तरीका है .”औरकैसे अपने आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट किया जाए ? शब्दों से? विचारों से? शायद कुछ गतिविधियों से , यह ठीक है .  उन्होंने यह भी यही  चुना था.
उन्होंने तय किया: “मुझे उनकी सेवा करनी है  ” और तुम जानते ही  हो, ये संत, वास्तव में बहुत प्राकृतिक परिस्थितियों में रह रहे थे. उनके निवास के पेड़ के नीचे थे.हर दिन  विभिन्न पेड़ के नीचे. लेकिन लोकनाथ  दास गोस्वामी शौचालय के रूप में एक निश्चित स्थान का उपयोग कर रहे थे  – झाड़ियों में. और वैसे भी उनका कोई स्थायी निवास तो था नहीं और इसलिए  उनके पास  कुछ भी नहीं था. उनके पास एक छोटी सी धोती थी और व्यावहारिक रूप से उनकी सेवा करने का कोई अवसर ही नहीं था .युवक का फैसला किया: “. मैं अपने गुरु के शौचालय के लिए जगह साफ कर सकता हूँ ”  कुछ समय बाद लोकनाथ  गोस्वामी ने  देखा कि
“अरे,  इन झाड़ियों में इतनी अच्छी तरह से व्यवस्था हो रही है . कुछ तो यहाँ  हो रहा है “लेकिन उन्हें संदेह हुआ :”. कोई यह कर रहा है “तो अगली बार वे  एक दूसरी  झाड़ी में छिप गए और  और जाँचने के लिए कि हो क्या रहा था.तब सुबह  उन्होंने देखा कि नरोत्तमदास  एक गमछे में आरहे हैं ,बहुत खुशी से जप करते और गुनगुनाते हुए .   “ओह, मैं आता हूँ  और सेवा करता हूँ , सब साफ करता हूँ , और सब कुछ अच्छा कर देता हूँ .” और फिर अचानक लोकनाथ  गोस्वामी झाड़ियों से बाहर कूद पड़े और बोले हा: “अरे, बदमाश, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” “गुरुदेव, मैं आप कि कुछ सेवा करने की कोशिश कर रहा हूँ” “आह, नहीं … लेकिन जो  तुम्हें पसंद है,वो करो !” और उसने कहा. “ओह! गुरुदेव ने  आशीर्वाद दे दिया!मैं उनके आशीर्वाद के साथ सेवा कर सकता हूँ  “और भी अधिक खुश हो गया .
लेकिन लोकनाथ  वास्तव में अपने में सीमित थे  और उस व्यक्ति को स्वीकार करने को  को तैयार नहीं थे . तो बस इतना ही , कि  अन्य संतों ने भी उन्हें कहना शरू कर दिया: “गोस्वामी, तुम क्यों इतने  कठोर हो ? आप इस जवान आदमी क्यों यातना दे रहे हो ? वह इतना अच्छा है, समर्पित है, इतना  योग्य.है  तुम उसे क्यों स्वीकार नहीं करते? . वह तुम्हें बहुत पसंद करता है’उसने कहा: “नहीं” “लेकिन क्यों नहीं?” तब उन्होंने कहा: “तुम्हें पता है, मैंने  एक कसम खाई है . मैं किसीको  भी  शिष्य नहीं बनाता हूँ .”जरा कल्पना करी , यह बहुत गंभीर बात  है. यदि ऐसे स्तर का  एक संत एक व्रत ले लेता है, तो इसका  मतलब होता  है, यह गंभीर है. लेकिन तब साथ के संतों ने कहना शुरू किया: “अरे, एक मिनट रुको. इस युवा ने  भी एक व्रत लिया  है. . वह अपना जीवन देने के लिए तैयार है, लेकिन वह आपका ही  शिष्य बनेगा  “तो फिर लोकनाथ  गोस्वामी ने कहा:” शायद उसका व्रत मेरे व्रत  से अधिक मजबूत है. उसे कहो  कि यमुना में जाकर , स्नान करे और फिर मेरे पास आए . “
लोकनाथ  दास  गोस्वामी ,जो उस स्थान के शासक थे,अपने शिष्य के कारण अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को तैयार थे.उन्होंने एक शिष्य को लिया,उसका नाम था नरोत्तम .नरोत्तम का अर्थ है”मनुष्यों मे सर्वश्रेष्ठ” और नरोत्तम  दास ठाकुर के कितने शिष्य थे?साथ हज़ार.यह संख्या का नहीं ,वरन गुणों का प्रश्न है.
इस प्रकार की प्रतिबद्धता और इसी प्रकार  की  मंशा हम में होनी चाहिए , खुद को वास्तव में आत्मसमर्पित करने हेतु.इस सौदे में सब कुछ गुरु पर निर्भर करता है.आधिकारिक तौर पर कहा गया है , सैद्धांतिक रूप से यह इस तरह है. लेकिन आप उदाहरण से समझ सकते हैं की  है कि गुरु और अतिसशक्तदिव्य व्यक्तित्व  अपने छात्रों की मधुर चाह के लिए के लिए ,अपने विचार और राय बदलने के लिए तैयार  हैं. इसलिए दीक्षा का अर्थ है ,एक प्रेम सम्बन्ध में प्रवेश करना.. यह एक सैद्धांतिक स्कूल नहीं  है कि आप उससे जुड़ जाएँ. यह एक प्रेम संबंध है.
चमत्कार होते ही हैं.श्रीला  श्रीधर  महाराज कहते हैं कि कृष्ण के  मार्ग में चमत्कार ही चमत्कार हैं.वे फिर और जोड़ते हैं:”तो चमत्कारों के लिए तैयार रहो!”क्या आप चमत्कारों के लिए तैयार हैं? जरा सोचिए,चमत्कार तो अभी से  घटने शुरू हो गए हैं,यहीं और अभी-आप तैयार हैं? अपने जाल को छोड़ने के लिए?

(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २५ .०२ .२००७ , सोफिया )
यदि दीक्षा से मैं एक शुद्ध भक्त  में परिवर्तित हो  जाता  हूँ -मेरा दिल सोने का हो जाए   – तो मुझे इसे लेना ही है ! लेकिन फिर अगला  प्रश्न उठता है -उस अधिकारिक व्यक्तित्व को किस प्रकार मिला जाए,कैसे  ढूंडा जाए? एक बार मेरे एक प्रिय गुरुभाई ने कहा : “ओह, मैंने इसके लिए  भारत जाने का फैसला किया है .मैं अपने मास्टर की  खोज  करना चाहता हूँ “लेकिन भारत जाने के बदले, वह ,   अपने गुरुदेव को ढूँढने  के लिए , नंदा फलवा फार्म के  लिए चल पड़ा – जो  सिर्फ तीस किलोमीटर की दूरी पर था , तीन हजार किलोमीटर  नहीं.खोज, आन्तरिक खोज  होनी चाहिए. और जब मैं अपनी संभावनाओं की  धार पर अकेले पहुंचा हूँ , तो मुझे कुछ  कुछ अन्य मार्गदर्शन लेना है , किसी और  उच्च स्थल   से. लेकिन  हो क्या रहा है:आपको  एक निमंत्रण मिला, तो आपको यह  बहुत पसंद आता है और यह इतना रोमांचक है -कि आप कूदने लगते हैं क्या आप कुछ  जानते है,आपके लिए क्या   इंतज़ार कर रहा है ? क्या आपको मालूम भी है कि भक्ति परिधि के भीतर क्या है? क्या तुम्हें यकीन है कि यह आपके लिए है भी या नहीं ?क्या गुरु-सेवा के लिए आप सारा जीवन समर्पित कर सकते हो?ये बड़े प्रश्न हैं .लोग  गुरुओं की जांच करने के आदी हो गए हैं . उनके गुण क्या हैं, वे किस तरह की योग्यताओं वाले हैं , वे ऐसे हों,वेसे हों….. क्योंकि मैं इतना महान हूँ कि मुझे  सबसे अच्छा गुरु चाहिए , जो शास्त्रों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करता हो . लेकिन अगर मैं आप को उन सभी गुणों के विषय में बताऊँ,जिनकी  एक शिष्य से अपेक्षा की जाती है…किसी को भी उस सूची में रुचि नहीं है.अच्छा है उसे भूल ही जाएँ.पर आपको ज़रा थोडा सा आइडिया दे दूं- भावी शिष्य मेरा मतलब है उम्मीदवार  कोशिक्षित,युवा,स्वस्थ,संपन्न,बुद्धिमान,हार प्रकार सर उत्तमऔर पूर्ण रूप से समर्पण के लिए तैयार होना चाहिए.किस्में हैं ये सभी योग्यताएं?पर तब आप भी पूछ सकते हैं:अगर कोई इतना ही उत्तम है तो उसे गुरु की आवश्यकता ही क्या है?!तब किसी चमत्कारिक प्रबंध  से आप मास्टर से मिलते हैं और उनसे कहते हैं:”मैं आपका शिष्य बनना चाहता हूँ.”अपने ह्रदय  की गहराई  से मैं तुम्हें  सुझाव देता हूँ : अगर कोई आप से मिलता है और कहता  हैं: “तुम्हें तो  मेरा  शिष्य होना चाहिए” तो उस से बचने की कोशिश करना या सीमा में रहो .जांच करो : “क्यों?” क्योंकि शास्त्रीय कहानियों में यह थोड़ा अलग है. सिर्फ इसके कि अगर आप को प्रभु यीशु मिलते हैं और वे आप से कहते हैं  कि आप “मेरे पीछे आओ!” तो यह करो  ! यह करो! संकोच मत करो! पीटर की तरह मत बनो. प्रभु  ने उस से कहा: आओ मेरे पीछे आओ!और उन्होंने कहा: ” लेकिन मेरे जाल के बारे में क्या करू ?” ” मेरे आतंरिक -जाल  के बारे में क्या करूं ” – 21 वीं शताब्दी में पीटर कहते हैं… “अपने इन्टरनेट के बारे में क्या करूं ” बस आओ ! मेरे पीछे आओ ! “कोई बात नहीं, कुछ सोचो नहीं ​​. अपने मोह को त्याग दो ., मेरे साथ आओ. “लेकिन  संत, शिक्षक , और उस क्षमता के प्रतिनिधि बहुत कम प्रकट  होते  हैं. भारतीय परंपरा में विभिन्न  कहानियां कही जाती हैं – जब चेले अपने मास्टर से   मिलने और उनके खोज के लिए इतने  उत्सुक होते  हैं. एक कहानी  नरोत्तम  दास ठाकुर और लोकनाथ  दास गोस्वामी की कहानी है. लोकनाथ का अर्थ है   “संसार का स्वामी” . वह बहुत ही त्यागी व्यक्ति था- हमेशा अपने अभ्यास  के लिए समर्पित,बहुत लोगों से मिलना नहीं,समय बर्बाद नहीं करना  ,इसलिए उन्हें  एक महान संत माना जाता था. वहाँ एक संभावित उम्मीदवार था – यह थे भविष्य के नरोत्तम  दास.उन्होंने तय किया: “लोकनाथ !वे ही  मेरे गुरु होगें  “तो उन्होंने  मास्टर से संपर्क किया, वे उसके पास गए और कहा: . “अरे गुरु, मुझ पर दया हो, कृपया मुझे अपने  शिष्य के रूप में स्वीकार कर लें “उन्होंने कहा:”यहाँ से बाहर हो  जाओ! यह मेरा काम नहीं है. मैं योग्य नहीं हूँ. संतों के पास जाओ.  बहुत सारे महान संतों यहाँ हैं ,उनसे मिलो .उनके पास जाओ. मैं शिष्यों को स्वीकार नहीं करता . “” नहीं, नहीं, नहीं, मैंआपका अनुयायी बनना चाहता हूँ ! कृपया “” नहीं! बिल्कुल नहीं!तुम ऐसा नहीं कर सकते “और उन्होंने इस युवक को अस्वीकार कर दिया . बस अपने आप कल्पना कीजिए : आप एक महान संत के पास जाते हैं और  आप  आते हैं  अपने जीवन के साथ – यह आपकी सर्वोच्च   भेंट है-आप के पास जो कुछ भी है  सब कुछ.  . आप कहते हैं: “कृपया, मेरी ज़िंदगी स्वीकार करें “, और तब वह व्यक्ति  कहता है: “ए! यहाँ से निकल जाओ. वापस जाओ, मुझे परेशान मत करो.” हा?! आपका क्या भाव  है ?लग रहा है? आप जला हुआ सा  महसूस करते हैं .और आम तौर पर ऐसे क्षणों पर  पश्चिमी देशों वाले भाग खड़े होते है : “नहीं, मैं गलत था, वे  मेरे मास्टर  नहीं है. उन्होंने मुझे निराश किया है ! ” लेकिन नरोत्तम  अलग तरह के थे . उन्होंने कहा: “ओह! मेरे गुरुदेव इतने महान है! वह मेरी परीक्षा करना चाहते हैं , यह  देखने के लिए कि  मेरा  समर्पण असली है या नहीं . लेकिन तब क्या किया जाए ?” वह दार्शनिक रूप से बहुत अच्छी तरह से शिक्षित थे  और उन्होंने कहा:” मुझे अपने मास्टर को प्रसन्न करना है.यही एक तरीका है .”औरकैसे अपने आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट किया जाए ? शब्दों से? विचारों से? शायद कुछ गतिविधियों से , यह ठीक है .  उन्होंने यह भी यही  चुना था. उन्होंने तय किया: “मुझे उनकी सेवा करनी है  ” और तुम जानते ही  हो, ये संत, वास्तव में बहुत प्राकृतिक परिस्थितियों में रह रहे थे. उनके निवास के पेड़ के नीचे थे.हर दिन  विभिन्न पेड़ के नीचे. लेकिन लोकनाथ  दास गोस्वामी शौचालय के रूप में एक निश्चित स्थान का उपयोग कर रहे थे  – झाड़ियों में. और वैसे भी उनका कोई स्थायी निवास तो था नहीं और इसलिए  उनके पास  कुछ भी नहीं था. उनके पास एक छोटी सी धोती थी और व्यावहारिक रूप से उनकी सेवा करने का कोई अवसर ही नहीं था .युवक का फैसला किया: “. मैं अपने गुरु के शौचालय के लिए जगह साफ कर सकता हूँ ”  कुछ समय बाद लोकनाथ  गोस्वामी ने  देखा कि “अरे,  इन झाड़ियों में इतनी अच्छी तरह से व्यवस्था हो रही है . कुछ तो यहाँ  हो रहा है “लेकिन उन्हें संदेह हुआ :”. कोई यह कर रहा है “तो अगली बार वे  एक दूसरी  झाड़ी में छिप गए और  और जाँचने के लिए कि हो क्या रहा था.तब सुबह  उन्होंने देखा कि नरोत्तमदास  एक गमछे में आरहे हैं ,बहुत खुशी से जप करते और गुनगुनाते हुए .   “ओह, मैं आता हूँ  और सेवा करता हूँ , सब साफ करता हूँ , और सब कुछ अच्छा कर देता हूँ .” और फिर अचानक लोकनाथ  गोस्वामी झाड़ियों से बाहर कूद पड़े और बोले हा: “अरे, बदमाश, तुम यहाँ क्या कर रहे हो?” “गुरुदेव, मैं आप कि कुछ सेवा करने की कोशिश कर रहा हूँ” “आह, नहीं … लेकिन जो  तुम्हें पसंद है,वो करो !” और उसने कहा. “ओह! गुरुदेव ने  आशीर्वाद दे दिया!मैं उनके आशीर्वाद के साथ सेवा कर सकता हूँ  “और भी अधिक खुश हो गया .       लेकिन लोकनाथ  वास्तव में अपने में सीमित थे  और उस व्यक्ति को स्वीकार करने को  को तैयार नहीं थे . तो बस इतना ही , कि  अन्य संतों ने भी उन्हें कहना शरू कर दिया: “गोस्वामी, तुम क्यों इतने  कठोर हो ? आप इस जवान आदमी क्यों यातना दे रहे हो ? वह इतना अच्छा है, समर्पित है, इतना  योग्य.है  तुम उसे क्यों स्वीकार नहीं करते? . वह तुम्हें बहुत पसंद करता है’उसने कहा: “नहीं” “लेकिन क्यों नहीं?” तब उन्होंने कहा: “तुम्हें पता है, मैंने  एक कसम खाई है . मैं किसीको  भी  शिष्य नहीं बनाता हूँ .”जरा कल्पना करी , यह बहुत गंभीर बात  है. यदि ऐसे स्तर का  एक संत एक व्रत ले लेता है, तो इसका  मतलब होता  है, यह गंभीर है. लेकिन तब साथ के संतों ने कहना शुरू किया: “अरे, एक मिनट रुको. इस युवा ने  भी एक व्रत लिया  है. . वह अपना जीवन देने के लिए तैयार है, लेकिन वह आपका ही  शिष्य बनेगा  “तो फिर लोकनाथ  गोस्वामी ने कहा:” शायद उसका व्रत मेरे व्रत  से अधिक मजबूत है. उसे कहो  कि यमुना में जाकर , स्नान करे और फिर मेरे पास आए . ” लोकनाथ  दास  गोस्वामी ,जो उस स्थान के शासक थे,अपने शिष्य के कारण अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने को तैयार थे.उन्होंने एक शिष्य को लिया,उसका नाम था नरोत्तम .नरोत्तम का अर्थ है”मनुष्यों मे सर्वश्रेष्ठ” और नरोत्तम  दास ठाकुर के कितने शिष्य थे?साथ हज़ार.यह संख्या का नहीं ,वरन गुणों का प्रश्न है. इस प्रकार की प्रतिबद्धता और इसी प्रकार  की  मंशा हम में होनी चाहिए , खुद को वास्तव में आत्मसमर्पित करने हेतु.इस सौदे में सब कुछ गुरु पर निर्भर करता है.आधिकारिक तौर पर कहा गया है , सैद्धांतिक रूप से यह इस तरह है. लेकिन आप उदाहरण से समझ सकते हैं की  है कि गुरु और अतिसशक्तदिव्य व्यक्तित्व  अपने छात्रों की मधुर चाह के लिए के लिए ,अपने विचार और राय बदलने के लिए तैयार  हैं. इसलिए दीक्षा का अर्थ है ,एक प्रेम सम्बन्ध में प्रवेश करना.. यह एक सैद्धांतिक स्कूल नहीं  है कि आप उससे जुड़ जाएँ. यह एक प्रेम संबंध है. चमत्कार होते ही हैं.श्रीला  श्रीधर  महाराज कहते हैं कि कृष्ण के  मार्ग में चमत्कार ही चमत्कार हैं.वे फिर और जोड़ते हैं:”तो चमत्कारों के लिए तैयार रहो!”क्या आप चमत्कारों के लिए तैयार हैं? जरा सोचिए,चमत्कार तो अभी से  घटने शुरू हो गए हैं,यहीं और अभी-आप तैयार हैं? अपने जाल को छोड़ने के लिए?



(श्री भ. क.तीर्थ  महाराज के व्याख्यान से उद्धृत , २५ .०२ .२००७ , सोफिया )
चेतना के एक स्तर  से दूसरे स्तर तक के  स्थानांतरण हेतु  कुछ साधन होना चाहिए, और यह साधन  आध्यात्मिक अधिकार है. हमने  प्रक्रियाओं पर चर्चा की है -जैसे  सोना   और जागते रहना . तो आध्यात्मिक जागृति की प्रक्रिया क्या है?आप इसे क्या कहते हैं?इसे दीक्षा कहते हैं.दीक्षा क्या है?दीक्षा क्या है इस बारे में आप की राय क्या है,
यशोदा : दूसरा जन्म.
हरी -लीला : यह किसी के लिए विचार की प्रस्तुति है.
रामविजय : नृत्य के लिए आध्यात्मिक निमंत्रण.
कृपाधाम : समर्पण का प्रथम चरण.
प्रेमा -लता : यदि कोई एक मंडली विशेष में स्वीकार्य हो.
तीर्थ  महाराज : हाँ …..,मेरी परिभाषा है :एकमात्र अवसर.दीक्षा ,एकमात्र अवसर है. एकमात्र अवसर का क्या मतलब है ?और दीक्षा-किसमें दीक्षा?एक दू;स्वप्न से दूसरे दू;स्वप्न में.एक मूर्खता से दूसरी बड़ी मूर्खता में?या किन्हीं रहस्यों में?या -जैसा कि तुमने कहा–निमंत्रित करना,  किसी को विद्यालय में पढाई  के लिए स्वीकार करना,कुछ सीखना.आध्यात्मिक प्रगति आरंभ करना, उसकी समाप्ति नहीं. कभी -कभी लोगों की चेतना इतनी सीमित होती और सशर्त होती है कि उस शर्त को वे उससे अधिल सशक्त शर्त से ही हटा सकते हैं. तो यदि आप को कोई लत लगी है,तो आप उस लत को दूसरी लत से ही बदल सकते हैं.आप अपनी परछाई अपने साथ लाते है.पहले आप  को किन्ही बुरी आदतों की सनक थी ,अब आप  किन्हीं सिद्धांतों के प्रति सनकी बन गए हो.एक जैसा,तरीका एक जैसा ही है. पर,यह विषय जरा हटकर है.पर तरीका बिलकुल वही है.क्या यही वास्तविक दीक्षा है?एक दू;स्वप्न से दूसरे दू;स्वप्न में?नहीं.वास्तविक दीक्षा का अर्थ है,ज्ञानोदय का आरम्भ.अत:यही एकमात्र अवसर है.
शीर्षस्थ  एक परिभाषा देते हैं है कि दीक्षा चमत्कार का अभ्यास करने कि भातिं है.ताकि  चमत्कार संभव  हो सके.
चमत्कारों के कितने सारे साधन हैं.अधिकतर हम सोचते हैं कि चमत्कार इच्छाओं कि पूर्ति होने पर घटे हैं.”मुझे इतना अच्छा काम मिल गया-चमत्कार है!ओह,में इस सुन्दरी से मिला –एक बुरा सपना–अरे नहीं-बुरा सपना नहीं – एक और चमत्कार!”
लेकिन आप जानते हैं,  एक विशेष पशु है, जिसे  कामधेनु  कहा जाता है.  “धेनु” का अर्थ है गाय, और “काम” इच्छा है. तो कामधेनु है विशेष पशु , वह असीमित दूध दे सकती  है. आप देख सकते हैं कि प्राचीन पारंपरिक संस्कृति में गाय बहुमूल्य  थी ,जब तक यह ,सजीव, जीवित थी  , क्योंकि तब यह दूध देती थी , बछड़ों को जन्म देती थी  – तो वे इसे जीवित रखते थे .. अब समय बदल गए हैं और कुछ लोगों को लगता है कि एक गाय तब तक  अच्छी  है जब  हम उसे  समाप्त  कर दें. वैसे भी, काम-धेनु  असीमित मात्रा में ढूध दे सकती है.इसलिए यदि  दूध, घी, पनीर आदि , सबसे अच्छी  भोजन सामग्री के लिए  आपकी इच्छा है, तो आप के पास  एक काम-धेनु  हो. लेकिन आप जानते हैं,कामदेव-धेनु   पहाड़ों में नीचे-ऊपर नहीं चल रहीं हैं. और एक काम -धेनु  कि क्षमता  थोड़ी सी सीमित है , क्योंकि यह केवल दूध देती है. लेकिन  हमारी तो इच्छाओं की  एक इतनी  लंबी सूची है, कि  एक काम -धेनु से तो  हमें पूरा नहीं होता.  –
आध्यात्मिक जीव विज्ञान के अनुसार हम जंगल के आसपास चलते हैं और हम कुछ अन्य प्रजातियों खोजने की कोशिश करते हैं – यह है  कल्प वृक्ष-, इच्छा को पूरा करने वाला  पेड़ . यह बेहतर है, यह विभिन्न प्रकार की इच्छाओं को पूरा कर सकता  है. आपको वह  पुरानी  कहानी है याद है  कि एक भूखे  भिखारी को इतनी  थकान लगी , कि वह सिर्फ एक पेड़ की छाया में कुछआराम करना चाहता था. याद है. और उसने कहा:   “ओह! मैं बहुत प्यासा हूँ! मुझे पानी चाहिए! “इसके तत्काल उसे  थोड़ा पानी दिखाई दिया. उपास आ रसने सोचा: “यह बहुत दिलचस्प है! . हो सकता है यह  चमत्कार है “उसने  पानी ले लिया, और तब  कहा:” जलअच्छा है, लेकिन पेट खाली है. मैं बहुत भूखा हूँ! काश खानेपीने की कुछ चीजें भी होतीं .”.फिर अचानक प्रसाद की एक बड़ी प्लेट के उसके सामने प्रकट हो गयी . उसने  खाना  शुरू कर दिया और तृप्त हो गया . तो उसे  समझ में आया : “ओह, मैं इच्छा-वृक्ष  के नीचे बैठा हूँ, काफी अच्छा है! यह बढ़िया है .” “उसने  कहा: “.अब मैं संतुष्ट हूँ, लेकिन कितना  अच्छा होगा अगर कोई मुझे एक मालिश कर देता .. ..”जल्द ही नौकर , परिवार, पशु, मकान – सब कुछ अभी या बाद में आ रहा था  और आता जा रहा था , और वह  बढ़ता जा रहा था. अंत में वह एक राजा की तरह महसूस करने लगा और उसने  कहा: “अब मैं इतना शक्तिशाली हो गया हूँ   कि मैं  एक बाघ से भी लड़ सकताहूँ!”बेशक, तुरंत पेड़ के नीचे बाघ प्रकट हो गया.
अत: इच्छा-वृक्ष (कल्पतरु)कामधेनु से भी बेहतर है,यह विभिन्न इच्छाओं को संतुष्ट कर सकता है.अगली बार जब आप वितोषा पर घूमने जाएँ और किसी पेड़ के नीचे बैठे हों -तो बाघ से पहले रूक जाएँ.
चमत्कार एक और माध्यम से हो सकते हैं  और वो साधन है चिंतामणि पत्थर .यह चिंतामणि पत्थर बहुत विशेष है.यह परस -पत्थर है.यह जो कुछ भी छुए-चाहे लोहा ही हो,उसे सोने में बदल देता है.यह सर्वोत्तम है!सोने से आप जो चाहते हो,वह ले सकते हो.और यह जितना चाहो ,उतना बना सकते हैं.चिंतामणि पत्थर कि बस एक यही सीमा है  — यह दूसरा चिंतामणि पैदा नहीं कर सकता.इसमें यही कमी है.
इसलिए अगर आप  आध्यात्मिक रूप से  जागृत होना चाहते हैं, कामदेव-धेनु  के पास मत जाइए,कल्प वृक्ष के नीचे बैठें  नहीं,  चिंतामणि पत्थरों से संतुष्ट नहीं हो. क्योंकि इनसे,  चमत्कारों के लिए जो आपकी  इच्छा है,वह  पूरी  नहीं होगी . आध्